ऐ चाँद !


काश !
कि पास होती
एक लंबी सी डोरी
फ़ेंक कर उसे
खींच लेता तुम्हे
अपनी ओर
फिर देखता
कैसे दूर रहते
तुम ।
पूरा का पूरा
तुम्हें बाहों में भरकर
उतार लेता
कहीं गहरे
कि बस…
फिर मेरे ही रहते तुम
ऐ चाँद
काश !
कि मेरे पास
एक लंबी सी डोरी होती ….!!!

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कच्ची मिट्टी थी !


कच्ची मिट्टी थी

पकने को डाल दिया

तपती आँच पर

तपो – पको

हो जाओ थोड़ा सुर्ख

थोड़ा मज़बूत कि

कच्ची मिट्टी को 

कोई भी रौंद सकता है

लेकिन पक्की ?

कौन बतलाए कि

तोड़ सकता है उसे भी कोई

एक ही झटके में

बिखर जायेगी

कई – कई टुकड़ों में

मिट्टी है

मिटना ही उसकी नियति !

 

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स्पर्श मात्र से !


पानी की इक बूँद सामान तुम

स्पर्श मात्र से

हरी हो उठती हूँ

आ जाती है सूखे

कुम्हलाए पत्तों में जान

और हवा के साथ

जी उठता है जीवन

कि तुम्हारा दिखना भर

उमड़ने लगते हैं बादल

घिर आती हैं घटाएँ

चूम जाती हैं मुझे

दे जाती हैं पैगाम

कि बस

आने को हो तुम

और सूख रही जड़ों में

लौट आती है जान

तुम्हारे स्पर्श मात्र से !

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रिश्तों की रजाई


रजाई की गरमाहट है अब भी वही

न कोई परिवर्तन

समय के साथ

बस रूप बदले

कभी खद्दर , कभी वेलवेट

और कभी सिल्क

रुई से भरी वजन में भारी

बेहद हलकी पॉलीफ्रिल वाली

जब भी आगोश में जाएँगे

आप उसके

वही गरमाहट वही सेंक

आज भी

मगर रिश्तों की रजाई !

न पहले सी गरम

न पहले सी भारी

न कोई परिवर्तन

हुआ उसके रूप में

फिर भी …

कम हुई गरमाहट बोलो कब कहाँ

रिश्तों की रजाई में

अब ठण्ड का बसेरा है

खोजती है वो भी

इक ताप गरम सेंक की !

 

 

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न पूछना कभी !


कई बार तुमसे
ढेर सारी बातें
करने को जी चाहता है
लेकिन मैं
बात नहीं करता
डरता हूँ
ये मत पूछना
किससे !
यही कहा था न तुमने
और
जड़ हो गए थे
हमारे शब्द, वहीँ कहीं
तुम मेरे हो ,सदा से मेरे
मालूम है मुझे
इसलिए, नहीं पूछा मैंने
कुछ भी
हाँ ! एक बात ज़रूर कहूँगी
कि कुछ ऐसा ही
या
यही कहने को
मेरा भी जी चाहता है
क्यों नहीं कह पाती
या डर लगता है
किससे 
बस ,ये न पूछना कभी  !!!

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मालूम है !


मालूम है
जिस दिन
मेरी मृत्यु होगी
अचानक
कुछ नहीं होगा
मृत्यु की भी वजह होगी
हर चीज़ की
वजह होती है.
मृत्यु का दिन 
व्यक्ति की प्रशंसा का
ख़ास दिन होता है
उस दिन
मैं बहुत अच्छी लगूँगी
सभी की बातों में
कहीं कोई ख़ामी
होगी ही नहीं मुझमे.
मेरा मृत शरीर
सजा दिया जाएगा
अमृत पुष्पों से
अग्नि को
गोद लेने के लिए
जीवन फिर भी चलेगा
यही उसकी नियति 
उसे रुकना नहीं आता 
लेकिन ,क्या एक
औरत की मृत्यु 
होती है …..???

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बिन जड़ों के ….!


जड़ से अलग जब से हुए
जड़ हो गए हैं सब
जड़ बुद्धि जड़ शक्ति
हर तरफ है शोर
बिन जड़ों के हो रही
भला कैसे सबकी भोर
दबी – जमीं सिसकती
पुकारती जड़ें
इंसान अपने दंभ में
न सुनता इन्हें
बिन जड़ों के उड़ रहा
आज वो जड़हीन
कैसे रोपेगा कोई
बीज हवा में कहो ……!!!

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