आसान नहीं होता


मर जाना सबसे आसान है
लोग कहते हैं
लेकिन  

मरने की
चाह रखना
भले आसान हो
मर जाना

कतई आसान नहीं होता ।
कैसे मरुँ
कि कष्ट भी कम हो
और मर जाऊँ !
ज़रा सोचिये
ये मनःस्थिति
कैसे

मर पाता होगा कोई
वो घुटन वो दर्द

वो तकलीफ़
हर कोई नहीं सह सकता
मर जाना, आसान
कतई नहीं होता ….

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सफ़र …


काश ! ज़िंदगी
सुपरफास्ट ट्रेन सी होती
वातानुकूलित
शयनकक्ष में बैठाकर
पँहुचा देती
गंतव्य तक
यात्रा
कितनी आरामदायक होती
थोड़ा विलंब
शायद वहाँ भी होता
किंतु
इतना तो नहीं ….
मालगाड़ी सी ज़िंदगी
कोयले से भरी
तपती है धूप में
जलती है
भीगती है
सूखती है
उछलती है
गिरती है फिर भी
ख़त्म नहीं होती
बड़ा लंबा सफ़र
तय करना होता है ….!!!

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ए एन 32


तुम्हारा कुछ पता नहीं
कहाँ हो ? कैसे जानें
ज़िंदगी की नई शुरुआत
तुम्हीं से थी
पिछले सत्रह वर्षों से
एक दिन भी न गुज़रा
तुम्हारे बगैर
लगातार सालों साल
हम साथ गए समंदर पार
और देश के सभी कोनों से लेकर
विदेश यात्रा तक
कभी डर न लगा
लेकिन आज
जब तुम्हारी कोई ख़बर नहीं मिल रही
डर रहा हूँ
किसी अनहोनी से
तुम लौट आओ सकुशल
कि देश को ज़रुरत है तुम्हारी
कई परिवार
राह तक रहे
उनकी रौशनी भी
तुम्हारे साथ है
मुझे, नींद नहीं आती आजकल
कि बिन तुम्हारे
फ़ैल गया है सन्नाटा
एक सैनिक की ज़िंदगी में ।

 

 

 

 

 

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जलन !!


गर्म वैक्स की पट्टियाँ
लगाते , खींचते
वो हँस रही थी
नहीं हो रहा था
उसे कोई दर्द
गर्म वैक्स की पट्टियों का
घर था उसका
सब की सब
चिपकी थीं उसके जिस्म पर !

 

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तिराहा


तिराहे को
परिभाषित करती हुई
शेष जगह पर
उतरते हैं झुंड के झुंड
कबूतर
जिन्हें मिल जाता है
बिन प्रयास
अच्छा स्वादिष्ट दाना
वहाँ पर
सुबह – शाम लोग दिख जायेंगे
कबूतरों को दाना
चुगाते हुए ।
उसी जगह के दोनों या तीनो
कोनों पर बैठे रहते हैं
दाना बेचने वाले
अलग – अलग रेट के हिसाब से
प्लेटों में सजा हुआ दाना
खुला ही रखा रहता है
लेकिन
कोई भी कबूतर
नहीं खाता
उनकी प्लेट से एक भी दाना
जब तक कि कोई उन्हें खरीद कर
उसे कबूतरों के नाम न कर दे
और हम ?
अपनों से ज़्यादा
होती नज़र
दूसरों की प्लेट पर
नाहक , नाजायज़
सब स्वीकार है
बल्कि माहिर हैं ,छीन कर लेने में
हाँ ! भला  
कबूतरों से
कैसी बराबरी …!!!

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मेढकी


पास के पोखर में
उछलतीकूदती
दिख जाती थी अक्सर ही
कि इक रोज़
जम के बारिश हुई
चारों तरफ़ जल ही जल
बह गई वो
उसी जल के साथ
एक नए प्रपात में
बारिश थमी
जलस्तर घटा
और घट गया वो प्रपात भी
वो तो
पोखर भी था
खेल के लिए
उसे ले आया था कोई
हांडी में भरकर
भरी हांडी में चढ़ी थी
जलते चूल्हे पर अब वो
गर्म होते पानी में कूदती रही
करती रही खुद को
हांडी में संतुलित
तापमान बढ़ता रहा
जलस्तर घटता रहा
मेढकी कूदती रही
बिठाती रही सामंजस्य
कि हांडी ठंडी होगी
और बचा रहेगा उसका ये घर
हांडी अब उबाल पर थी
मेढकी थक चुकी थी
निकल जाना चाहती थी बाहर
लेकिन !
शेष थी ताकत
शेष था पानी ….!!!

 

 

 

 

 

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मौन – 2


हमारे तुम्हारे बीच का
ये मौन
बहुत शोर करता है
इसकी बातें
कभी ख़त्म नहीं होतीं
अनगिनत सवाल-जवाब
कभी नहीं थकते
आए कितने ही
उतार – चढ़ाव
नहीं टूटा ये मौन
हाँ !
जब बेचैन हुई रूह
एक – दूजे के लिए
तेज़ आँधी सा उड़कर
पँहुच गया ये हम तक
जो तुमने कहा
जो हमने कहा
सब सुनता रहा
भावों को नज़रों से
बोलता रहा मौन …
सच है
हमारे बीच का
ये मौन
बहुत शोर करता है ….!

 

 

 

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