नहीं जँचती तुम पर …!


नहीं !
उदासी से
कोई बैर नहीं मुझे
बस
तुम पर नहीं जँचती
ज़रा भी !
खीझ आती है
कि क्यों उदास हो
झल्ला पड़ती हूँ
खुद पर
कि कैसे लाऊँ मुस्कान
तुम्हारे चेहरे पर
सच्ची वाली !
कह पाती हूँ
सिर्फ इतना
अपना ख़याल रखना
जबकि
हो जाती हूँ उदास
ये सोचकर
कि उदास हो तुम।
उदासी से
कोई बैर नहीं मुझे
बस
तुम पर नहीं जँचती
ज़रा भी ..!!!

8 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

मेरा प्रथम काव्य संग्रह ‘तेरे समक्ष’ प्रकाशित !


Cover-Indu Singh2 - Copy

सभी आदरणीय ब्लॉगर एवं पाठकों को मेरा सादर नमस्कार ,

आप सभी की शुभकामनाओं से मेरी कविताओं का पहला संग्रह ” तेरे समक्ष ”  हिंदी अकादमी दिल्ली से स्वीकृत हुआ है तथा जयपुर के ‘ बोधि प्रकाशन ‘ से प्रकाशित हुआ है .पुस्तक का लोकार्पण 9 मई 2015 को  आदरणीय नामवर सिंह जी के द्वारा किया गया .यूँ  ही  लेखन को प्रेरित करते रहिएगा और मै , सदैव बेहतर लिखने की कोशिश जारी रखूँगी .

सादर एवं सस्नेह – आपकी इंदु       IMG_0099

13 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

ऐ चाँद !


काश !
कि पास होती
एक लंबी सी डोरी
फ़ेंक कर उसे
खींच लेता तुम्हे
अपनी ओर
फिर देखता
कैसे दूर रहते
तुम ।
पूरा का पूरा
तुम्हें बाहों में भरकर
उतार लेता
कहीं गहरे
कि बस…
फिर मेरे ही रहते तुम
ऐ चाँद
काश !
कि मेरे पास
एक लंबी सी डोरी होती ….!!!

4 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

कच्ची मिट्टी थी !


कच्ची मिट्टी थी

पकने को डाल दिया

तपती आँच पर

तपो – पको

हो जाओ थोड़ा सुर्ख

थोड़ा मज़बूत कि

कच्ची मिट्टी को 

कोई भी रौंद सकता है

लेकिन पक्की ?

कौन बतलाए कि

तोड़ सकता है उसे भी कोई

एक ही झटके में

बिखर जायेगी

कई – कई टुकड़ों में

मिट्टी है

मिटना ही उसकी नियति !

 

4 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

स्पर्श मात्र से !


पानी की इक बूँद सामान तुम

स्पर्श मात्र से

हरी हो उठती हूँ

आ जाती है सूखे

कुम्हलाए पत्तों में जान

और हवा के साथ

जी उठता है जीवन

कि तुम्हारा दिखना भर

उमड़ने लगते हैं बादल

घिर आती हैं घटाएँ

चूम जाती हैं मुझे

दे जाती हैं पैगाम

कि बस

आने को हो तुम

और सूख रही जड़ों में

लौट आती है जान

तुम्हारे स्पर्श मात्र से !

2 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

रिश्तों की रजाई


रजाई की गरमाहट है अब भी वही

न कोई परिवर्तन

समय के साथ

बस रूप बदले

कभी खद्दर , कभी वेलवेट

और कभी सिल्क

रुई से भरी वजन में भारी

बेहद हलकी पॉलीफ्रिल वाली

जब भी आगोश में जाएँगे

आप उसके

वही गरमाहट वही सेंक

आज भी

मगर रिश्तों की रजाई !

न पहले सी गरम

न पहले सी भारी

न कोई परिवर्तन

हुआ उसके रूप में

फिर भी …

कम हुई गरमाहट बोलो कब कहाँ

रिश्तों की रजाई में

अब ठण्ड का बसेरा है

खोजती है वो भी

इक ताप गरम सेंक की !

 

 

3 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

न पूछना कभी !


कई बार तुमसे
ढेर सारी बातें
करने को जी चाहता है
लेकिन मैं
बात नहीं करता
डरता हूँ
ये मत पूछना
किससे !
यही कहा था न तुमने
और
जड़ हो गए थे
हमारे शब्द, वहीँ कहीं
तुम मेरे हो ,सदा से मेरे
मालूम है मुझे
इसलिए, नहीं पूछा मैंने
कुछ भी
हाँ ! एक बात ज़रूर कहूँगी
कि कुछ ऐसा ही
या
यही कहने को
मेरा भी जी चाहता है
क्यों नहीं कह पाती
या डर लगता है
किससे 
बस ,ये न पूछना कभी  !!!

5 टिप्पणियाँ

Filed under कविता