मेरे काव्य संग्रह ” तेरे समक्ष” की समीक्षा


तेरे समक्ष – इंदु सिंह
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कवयित्री इंदु सिंह की कविताओं का पहला संग्रह “तेरे समक्ष “ एक ऐसा काव्य संग्रह है जिस पर हिन्दी साहित्य के दिग्गजों, आदरणीय केदारनाथ सिंह जी , चित्रा मुद्गल जी और अनामिका जी की टिप्पणियाँ एवं आदरणीय लक्ष्मी शंकर बाजपयी जी की भूमिका के तौर पर समीक्षा पहले से ही अंकित है | ऐसे में ,मुझे इस संग्रह पर लिखने में भी संकोच का अनुभव हो रहा है | फिर भी ,कोशिश करती हूँ कि आप तक मैं कविताओं पर अपनी बात पहुंचा सकूं |
संग्रह की शुरुआती प्रकृति – चित्रण की कवितायें कवि‍यत्री के कोमल भावों को प्रकट करती हैं | अत्यंत ही सरल एवं सुबोध भाषा में कही गई ये कवितायें पाठकों के मन में भी उतनी ही सहजता से उतर जाती हैं —
सर्द दोपहर में बालकनी का वो कोना
जहां सूरज अपना छोटा सा
घर बनाता है अच्छा लगता है
हर ‘पहर ‘ के साथ
खिसकता हुआ वो घर ,जीवन पथ पर
चलना सिखाता है
कवयित्री की अभिव्यक्ति की सहजता संकलन की प्रत्येक कविता में दिखती है |जहां कविता ‘सविता ‘ में संघर्षरत वर्ग की स्त्री की पीड़ा है वहीं ‘गाँव है ,मालूम है मुझे ‘ में गाँव एक विषय मात्र नहीं अपनी बात कहता हुआ ,अपनी पीड़ा बयान करता हुआ एक जीता – जागता उत्तम पुरुष है –
गाँव हूँ ,मालूम है मुझे फिर भी
चर्चा सब जगह मेरी
मैं खो गया हूँ ये भी कहा किसी ने
बदल गया हूँ ये भी
मुझे ,मेरी पहचान को धूमिल
किया जा रहा है
गाँव को विषय बना दिया है आज
मुझ पर चर्चा मेरी चिंता
समझो बड़ा आज का मुद्दा
न आना है किसी को मेरे पास
न जानने हैं मेरे जज्बात
बस करनी चर्चा ख़ास
मेरी तरक्की मेरी खामियां
सच है ,गाँव से दूर रहकर गाँव की तमाम बातें की जाती हैं – बेहतर है कि गाँव में रहकर उसके विषय में सोचा ,समझा और कहा जाए | इसी क्रम में जिक्र करना चाहूंगी संकलन की एक और कविता “गाँव की लड़की “ का | कविता अपनी सरलता के साथ गाँव की लड़की का चित्रमय वर्णन प्रस्तुत करती है –
चूल्हे में कंडे सुलगाती
फूंकनी से फूँक मारती
चिमटी से लकड़ी सुधारती
धुंएँ से आँखों को मींजती
और फिर जलते चूल्हे पर
रखती हुई अदहन
काटती हुई साग
एक साथ
सारा काम कर लेने का विश्वास ……..
आँचल में
अभी भी बंधा है कैथा
कि खायेगी फुर्सत में कभी
हाँ वही
गाँव की लड़की
हाँ ,संकलन को पढ़ते हुए एक बात समझ में नहीं आई कि कविता ‘नहीं होना चाहती ‘ में कैक्टस की तरह होने की अभिलाषा रखने के बाद तुरत ही दूसरी कविता ‘कैक्टस के फूल ‘ में – “मैंने तुम्हे चाहा /और तुमने /मुझे चुभन दी ….. “ में उसी होने के प्रति उलाहना ?
खैर ,स्त्री-विमर्श सम्बन्धी कविताओं में कवयित्री की लेखनी खूब चली है | चाहे वह ‘सुर्ख औरत‘ हो चाहे ‘आहिस्ता–आहिस्ता ‘| कविता ‘आहिस्ता – आहिस्ता ‘ की कुछ पंक्तियाँ देखें ––
तैयार की जाती है औरत भी
इसी तरह
रोज छेदी जाती है उसके सब्र की सिल
हथौड़ी से चोट लेती है
उसके विश्वास पर और छैनी करती है तार – तार
उसके आत्मसम्मान को
कि तब तैयार होती है औरत
पूरी तरह
चाहे जैसे रखो
रहेगी
पहले थोड़ा विरोध थोडा दर्द
जरुर निकलेगा
आहिस्ता – आहिस्ता सब गायब
अत्यंत सहज एवं सरल बिम्ब सिल के कूटने से स्त्री – जीवन की त्रासदी को जोड़कर प्रस्तुत करना सचमुच सराहनीय है | कविता ‘ कच्ची मिट्टी ‘ भी इसी मूड की है | साक्षरता और काम के छोटेपन को बयान करती कविता ‘साक्षर हूँ ,नौजवान हूँ ‘ सहज ही मन को मोह लेती है | कविता ‘बचपन की याद ‘ एक खुशनुमा हवा के झोंके सी है | कविता ‘पापा आप हो सबसे ख़ास‘ में कवयित्री के पिता के प्रति आत्‍मीय भाव हुए हैं जो ह्रदय को छू जाते हैं |
कुल मिलाकर कविता की सहजता और सरलता के हिमायती पाठकों को यह संकलन जरुर पसंद आयेगा | इसे आप बोधि प्रकाशन से दिए गए ईमेल आई . डी पर मेल कर या फोन कर या www.booksansar.com से ऑनलाइन भी मंगवा सकते हैं-
ई – मेल – bodhiprakashan@gmail.com
फोन नंबर – 0141-4041794 & 098290-18087
आप चाहें तो दिए गए लिंक पर भी ऑर्डर कर पुस्तक मंगवा सकते हैं —http://www.booksansar.com/product/tere-samaksh/
— वीणा वत्सल सिंह, लखनऊ

वीणा वत्सल सिंह's photo.

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छाँव नेह की !


तपती धूप की जलन
और थकन के बाद
एक छाँव
तुम्हारे नेह की
कर देती है मुझे
शीतल
गायब हो जाती हैं
माथे की लकीरें .
सारी झल्लाहट
मुस्कान बन
बिखर जाती है
चेहरे पे मेरे ….!!!!

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नहीं जँचती तुम पर …!


नहीं !
उदासी से
कोई बैर नहीं मुझे
बस
तुम पर नहीं जँचती
ज़रा भी !
खीझ आती है
कि क्यों उदास हो
झल्ला पड़ती हूँ
खुद पर
कि कैसे लाऊँ मुस्कान
तुम्हारे चेहरे पर
सच्ची वाली !
कह पाती हूँ
सिर्फ इतना
अपना ख़याल रखना
जबकि
हो जाती हूँ उदास
ये सोचकर
कि उदास हो तुम।
उदासी से
कोई बैर नहीं मुझे
बस
तुम पर नहीं जँचती
ज़रा भी ..!!!

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मेरा प्रथम काव्य संग्रह ‘तेरे समक्ष’ प्रकाशित !


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सभी आदरणीय ब्लॉगर एवं पाठकों को मेरा सादर नमस्कार ,

आप सभी की शुभकामनाओं से मेरी कविताओं का पहला संग्रह ” तेरे समक्ष ”  हिंदी अकादमी दिल्ली से स्वीकृत हुआ है तथा जयपुर के ‘ बोधि प्रकाशन ‘ से प्रकाशित हुआ है .पुस्तक का लोकार्पण 9 मई 2015 को  आदरणीय नामवर सिंह जी के द्वारा किया गया .यूँ  ही  लेखन को प्रेरित करते रहिएगा और मै , सदैव बेहतर लिखने की कोशिश जारी रखूँगी .

सादर एवं सस्नेह – आपकी इंदु       IMG_0099

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ऐ चाँद !


काश !
कि पास होती
एक लंबी सी डोरी
फ़ेंक कर उसे
खींच लेता तुम्हे
अपनी ओर
फिर देखता
कैसे दूर रहते
तुम ।
पूरा का पूरा
तुम्हें बाहों में भरकर
उतार लेता
कहीं गहरे
कि बस…
फिर मेरे ही रहते तुम
ऐ चाँद
काश !
कि मेरे पास
एक लंबी सी डोरी होती ….!!!

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कच्ची मिट्टी थी !


कच्ची मिट्टी थी

पकने को डाल दिया

तपती आँच पर

तपो – पको

हो जाओ थोड़ा सुर्ख

थोड़ा मज़बूत कि

कच्ची मिट्टी को 

कोई भी रौंद सकता है

लेकिन पक्की ?

कौन बतलाए कि

तोड़ सकता है उसे भी कोई

एक ही झटके में

बिखर जायेगी

कई – कई टुकड़ों में

मिट्टी है

मिटना ही उसकी नियति !

 

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स्पर्श मात्र से !


पानी की इक बूँद सामान तुम

स्पर्श मात्र से

हरी हो उठती हूँ

आ जाती है सूखे

कुम्हलाए पत्तों में जान

और हवा के साथ

जी उठता है जीवन

कि तुम्हारा दिखना भर

उमड़ने लगते हैं बादल

घिर आती हैं घटाएँ

चूम जाती हैं मुझे

दे जाती हैं पैगाम

कि बस

आने को हो तुम

और सूख रही जड़ों में

लौट आती है जान

तुम्हारे स्पर्श मात्र से !

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