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ये दुनिया एक मेला ही तो है !


सब अलग- अलग रंग रूप लिए

अपने विचारों के साथ अपनी नज़र की दुनिया से जुड़े हुए

ज़रूरी नहीं कि आपको सब भाएँ

ज़रूरी नहीं कि आप उन्हें गले लगाएँ

ज़रूरी बस इतना कि सब के प्रति कोई दुर्भाव न पालें

परिस्थितियाँ और अनुभव सभी के अलग ही हैं

हमें नहीं पता कौन किस हाल में है और फिर भी मुस्कुरा रहा है

क्यों न ख़ुद को जानें और छोड़ दें उन्हें उनके हाल पर

कि किसी को उबरनें दें ख़ुद से, जबकि सिवा तकलीफ़ बढ़ाने के

कुछ और कर नहीं सकते

छोटा बड़ा,मोटा या पतला कोई नहीं होना चाहता

सब सुंदर हैं और सुंदर दिखना चाहते हैं

ज़रूरत एक साफ़ और तेज नज़र भर की है।

ये किताबें अलग – अलग विधा की

विषय भी अलग हैं फिर भी सब एक हैं मेले में

सब एक हैं बस्ते में

ये किताबों का मेला ये ज़िंदगी का मेला

फ़र्क क्या है ….ये दुनिया एक मेला ही तो है।

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नज़रिया !


भारत गंगा
पाकिस्तान इंडस
बांग्लादेश पदमा
नेपाल घाघरा
चीन ब्रम्हपुत्र
और अमेरिका ?
अब ये न पूछना कि ये क्या है
कहूँ कविता
तो आँखें न फैलाना
कयोंकि
ये चंद नाम नहीं कविता के
विश्व के कैनवास पर
भूत भविष्य और वर्तमान हैं।

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