चाह बन जाऊॅं


दिल आज बस ये चाहे
कि चाह बन जाऊँ
गर मिल सको तुम
तुम्हें गले लगाऊँ
वेदना है जितनी
सब समेट लाऊँ
आँचल में तुम्हें
कुछ इस तरह छिपाऊँ
दर्द को तुम्हारे मै स्वयं पी जाऊँ
जानती हूँ नीम हूँ मैं
नहीं और कोई
फिर भी तुम्हारे लिए कृष्ण मैं बन जाऊँ……

18 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

18 responses to “चाह बन जाऊॅं

  1. induravisinghj

    mamma you write very good poems . just keep writing.

    i love you.

    from -aryaman

  2. yashwant009

    कल 31/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

  3. Sanjay Mishraa 'habib'

    बहुत सुन्दर….
    सादर.

  4. saras darbari

    Just keep on writing …you are really good !

  5. santosh

    soch,klpana,sabdo ka smndr….vakhai lajbab likhti hai……

  6. expression

    Aryaman is right………
    u write so very well 🙂
    bless u both.
    anu

  7. वेदना को समेटना …दर्द को पी जाना …चाहत के प्रतिमान है ये …सुन्दर रचना की बधाई

  8. Reblogged this on हृदयानुभूति and commented:

    आज ‘ब्लॉग’ लेखन के दो वर्ष पूरे हुए बेहद खुश हूँ। ब्लॉग पर लिखी पहली रचना आप सभी के लिए। यूँ ही आप सभी का स्नेह और मार्गदर्शन मिलता रहे यही चाह है।

    सादर
    इंदु

  9. सतीश सक्सेना

    सुंदर चाह…

  10. Stage comes, when the difference between Radha and Krishna vanishes…Radha may become Neem and therefore Krishna…a really gud poetry.

  11. MONITA JAIN

    Maine aaj aapka poora blog dekha and I’m so glad to read all these……….WAKAI BAHUT SUNDAR…………..

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