साया


अँधेरे को चीरते हुए
बड़ी तेजी से एक साया
पीछा करता है ज़िन्दगी का
अंधेरा है संशय है और भय है
उस परछाँई का
जो भागने पर भी साथ नहीं छोड़ रही थी
न जाने उसने हाथों में क्या ले रखा है
तन बस अभी उस प्रहार से बचा है
अचानक नज़र आसमान पर गयी
अँधेरे में टिमटिमाता
एक तारा दिखा और मन ने कहा
अब सुकून है
(पर नहीँ वो सुकून नहीँ था)
अचानक वो तारा विलुप्त हो गया
और साये ने झट से तन को
जकड़ लिया
तभी कुछ सुगबुगाहट सी हुई
चिड़ियोँ की
जिनसे मिली ख़बर सुबह
होने की- झट देखा तो
साया गायब था
अब तन और मन दोनो को सुकून सा मिला था…

4 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

4 responses to “साया

  1. alok

    Aj parchaio se dar lagta hai………
    Aur mout se yarana acha hai………

  2. induravisinghj

    धन्यवाद आपका। ये कविता उन तीन कविताओं में से एक है जिसने मेरा परिचय एक कवियत्री के रूप में सबसे पहले लख़नऊ दूरदर्शन से करवाया। कहानी लेखन के सुझाव का स्वागत है…

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