आदत


लिखना
आदत है इस कलम की
बयाँ करती
है सारी दशा मन की
हर पल एक नयी पहचान है
किसे पता कौन यहाँ
कितना गुमनाम है
जब खुद ही की पहचान नहीं
औरों को कैसे जानेंगे
हर हवा है नयी
किस-किस को अपना मानेंगे.
भावनायें रही नहीं
भाव ही दिखते यहाँ
किससे कहें और क्या कहें
कैसे करें हाल बयाँ
हर साँस है नयी हर कारवाँ है नया
किसे ख़बर कौन कब बिखरा है कहाँ…!

5 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

5 responses to “आदत

  1. ye kahan se aati nai… itni sayari…:)
    kahin labson me gunaah na kar doon, sur jhukata hoon tujhe salaam ko… 🙂

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