आदर्श का पाठ


आदर्शों के उपदेश तो देते हैं सभी
परन्तु है यह मुश्किल
उन्हें निभाता हो कोई
यह चादर ओढ़ रखी है सिर्फ
दिखाने के लिए
अन्दर ही अन्दर स्वयं को
छुपाता है हर कोई
आदर्शों के साथ जीना ही
मानते हैं उसूल
पर समय आने पर मात्र
किताबी उपदेश करार देते हैं
बनते हैं समाज में
पात्र आदर्श का
किन्तु अपने ही घर में
कुपात्र हो जाते हैं
आदर्श को उत्कर्श बनाते-बनाते
स्वयं ही आदर्श का
अपकर्ष बन जाते हैं
शायद तभी हर दिन
आदर्श के लिए
आता है मौत बन कर
सच है
इसे नष्ट करने वाला
कोई अन्य नहीं
वो एक मात्र मनुष्य है
और सिर्फ मनुष्य है…!

2 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

2 responses to “आदर्श का पाठ

  1. आदर्शों के उपदेश तो देते हैं सभी परन्तु है यह मुश्किल उन्हें निभाता हो कोई, kitna sahi hai… yeh bas chand shabd hi rah gaye hai aaj!

    Bahut sundar blog hai apka aur aap likthi bhi khoob hai, well done 🙂

  2. शुक्रिया आरती,आपकी टिप्पणियोँ का दिल से स्वागत है।ये हमारा मनोबल हमेशा बढ़ाएंगी…

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