तपती धूप


दोपहर की चिलचिलाती धूप में
तेजी से बढ़ते कदम
कुछ थके से,कुछ रुके से
पड़ते हैं जिधर
अपने चिन्ह छोड़ जाते हैं
शायद तलाश है उन्हें एक राह की
पर वो कहाँ है यह नहीं मालूम।
रास्ते तो कई हैं हर कदम पर,
पर कदम उठते नहीं हैं हर डगर पर।
मालूम नहीं कितना लम्बा है
ये सफ़र
शायद ज़िन्दगी से कम ही हो।
हौसले बढ़े हुए हैं और कदम
रुके हुए,
एक सही दिशा की तलाश में
गिर-गिर के उठ रहे हैं।
तभी नज़र आई एक डगर
थी जिसमें रोशनी मगर,
वो रोशनी थी किसी के जलने की
करीब गए तो मालूम पड़ा कि
लाश थी इन्सानियत की
तब ये अहसास हुआ कि
दोपहर की चिलचिलाती धूप की तपन
कहीं अच्छी है
इन्सानित के जलने की तपन से…

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