रात्रि का आना कैसा


रात्रि अभी आई नहीं
और सूरज ढल गया
इस गोधूलि बेला में
न जाने कहाँ छुप गया।
हर क्षण है अब निशा का इन्तजा़र
लाख तारे समेटे
उसने पदार्पण किया
पर ये क्या,अभी तो पहला पहर है
और ये चीख कैसी
क्या ये शुरुआत है रात्रि की
अभी और भी है कुछ बाकी।
अचानक मन घबराया,भागा
पर कहीं न भाग पाया क्योंकि
रात्रि का था उसको भी डर
न जाने किस पहर में मिले
कौन सी ख़बर।
खामोशी को तोड़ती वो पत्तों की सरसराहट
झीँगुरों की किलकिल
संशय बढ़ा देती है
बन्द पलकों में दिखता है
सिर्फ अन्धेरा।
तभी कुछ चुभता है और
आँखें खुल जाती हैं
तब यकीन होता है कि
रात्रि आकर गई
यह सुबह की बेला है,नहीं तप कोई…

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2 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

2 responses to “रात्रि का आना कैसा

  1. alok

    man ki ankho s dekho, na ghabrao,na daro rat m thandak hai, shanti hai, anand hai.
    you written it very well……….very good…
    ratri ke bad alok…….hai……… this is jeevan hai………..

  2. आपके विचारों ने मेरी कविता में चाँद की शीतलता भर दी है आलोक जी। धन्यवाद.

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