उठो तुम एक बार


वीणा के तान जैसी मधुर
झनझनाहट कानों में पड़ी
हल्की सी नींद खुली तो,
सामने थी लालिमा खड़ी
आँचल पसारे हुए,उठो
आचमन भी करो
भोर हो गई है,
अब नमन भी करो।
कितने लम्बे समय से तुम
यूँ ही सो रहे हो
कुछ ध्यान भी है,कि कितनी
सदियाँ गुज़र गई हैं
पर तुम काठवत मानव
जड़वत यूँ ही पड़े रहे हो।
ये संगीत मधुर जो सुनाई दे रहा है
प्रकृति ने दिया है तुम्हारे लिए
उठो-सुनो और वरण करो इसका
इतना ही मधुर,तुम
बनाओ कोई रिश्ता
नहीं तो संगीत का ये मधुर स्वर भी
छिन जायेगा
और तब हे मानव
तुम यूँ ही जड़वत,काठवत
खड़े रह जाओगे…

2 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

2 responses to “उठो तुम एक बार

  1. alok

    Always be happy…………
    har pal ko jio, anand lo..
    very good written.

  2. तब हे मानव
    तुम यूँ ही जड़वत,काठवत
    खड़े रह जाओगे…
    socho aur aage badho
    nirantar chalte raho
    isi tarah likhte raho
    auron ko saath chalaate raho

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