दरिया (हास्य-व्यंग)


आज दोपहर बैठे थे हम
ऑफिस में अपने
ठंडी हवा के बीच
मगन थे सपने
तभी नज़र गई सामने
देखा कि दरिया है कोई
हम भी परेशान हो
लगे सोचने-भई ये क्या
कल तक तो यह था एक कमरा
जो आज बन गया है समंदर
मन में बड़ा कुतूहल भरा मैंने भी
बेचैनी से पूछा
अपनी साथी मित्र से-
कल तक न था यहाँ दरिया कोई
(तब पता चला ये
दरिया ही कमरा है)
छत से गर्मी की तेजी
बरदाश्त नहीं हो रही
तभी वो धीरे-धीरे पानी
नीचे दे रही
जिससे मिले ऑफिस को ठण्डक
सभी कर्मचारी हो जाएं तर।
तुम भी करो काम आराम से
न बेचैन हो इस धार से
यदि धार की गति बढ़ी
मालिक खुद ही टैंकर बुलाएंगे
या फिर उसमे-
रेगिस्तान को सुखाएंगे
पानी निकल जाएगा
तुम्हे कमरा नज़र आएगा
फिर न कहना कि
गर्मी से बेहतर वो दरिया था
जो गन्दा ही सही पर
पानी से भरा था…

6 टिप्पणियाँ

Filed under व्यंग्य

6 responses to “दरिया (हास्य-व्यंग)

  1. tum badal n jana,badardi sawan aana,,,
    plz if possible complete this poem..ravi

  2. Jay Panchal

    hey…nice one…i like this one very much…saurabh told me abt ur blog..and i really appreciate dt ur really a person wid talent. Havev a nice day. Tc.

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