सिर्फ तुम


जब कभी भी लिखना चाहूँ
क्यूँ तुम्ही चले आते हो तसव्वुर में
कब दी मैंने तुम्हें इजाज़त
फिर क्यूँ हर बार मेरा दिल छू जाते हो।
नहीं तुम मेरे हो,है मुझे मालूम
फिर क्यों हर पल मेरे ख़यालों में आते हो
चलना नहीं था साथ गर जीवन भर मेरे
फिर क्यूँ हर कदम पे दस्तक सुनाते हो
मैं बेबस क्या करूँ इस दिल का-
रहता पास मेरे फिर भी तुम इसे धड़काते हो…

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14 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

14 responses to “सिर्फ तुम

  1. “बड़ा नटखट अंदाज़
    तुम्हारा
    निरंतर लुभाता है
    जितना दूर जाता हूँ
    उतना पास बुलाता है ”

    खूबसूरत पंक्तियाँ सुन्दर ब्लॉग
    पहली बार देखा पढ़ा ,आनंद आया ,बधायी

  2. इस हौसला अफ़ज़ायी के लिए दिल से शुक्रिया राजेन्द्र जी…
    आपकी टिप्पणी ने एक नया हौसला भर दिया…

  3. हमें नहीं पता था कि आप भी कविता लिखती हैं.आज रवी ने लिंक पोस्ट किया था फेस्बुक पर सो जाना.अच्छा खासा लिखा है भाई…..रवी और आप,दोनों को बधाई!

  4. When i was reading your poem ,suddenly a thought came to my mind. You are not only good poet but also nice by heart.

    May God bless you.

  5. hi! i am reading ur poems for the past 2 days and couldnt stop myself following u .
    kabhi in panktiyon mein pahadi nadi ka bhatkav hai
    jisme bhatakna khud se kareeb hone jaisa lagta hai
    to kabhi aisa bahav hai jismein kinare tak aane ka man nahin karta .

    i wish u always flow like it .i would request u to kindly read my blog at springburn111.blogspot.com and convey ur response.

  6. “मैं बेबस क्या करूँ इस दिल का-
    रहता पास मेरे फिर भी तुम इसे धड़काते हो…” ..wow….billion dollar lines 🙂 so true…

  7. मैं बेबस क्या करूँ इस दिल का-
    रहता पास मेरे फिर भी तुम इसे धड़काते हो…

    subah subah khusboo de gaya….
    behtareen.

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