जीवन के हैं खेल अजब


जीवन के हैं खेल अजब
न कोई समझ पाया
किसने कितना विष है पिया
ये नशा किसे क्यों आया
कोई तो सुख में भी
सुखी नहीं
निज ढूढ़े नए बहाने
वो हैं क्यों इतने खुश
बस यही जाल फैलाया
काश जानते कि ईश्वर ने क्यों
बगिया में फूल खिलाया
जीवन है बगिया फूलों की
न कोई समझ ये पाया
रंगों की इस विविधता को
जो भी समझ है पाया
सही मायने में उसने ही
जीवन को अपनाया
जीवन के हैं खेल अजब
न कोई समझ पाया…

14 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

14 responses to “जीवन के हैं खेल अजब

  1. वाह! गूढ़ विषय पर सरल लेखनी!
    सुन्दर!

  2. alok

    Jeevan ki bagia ko hanste hue manh kao,
    dukhiyon ke jeevan ko bas tum hee manhkao
    Jeevan ka ye hee sar hai………..

    Verry good….

  3. “किसने कितना समझा
    क्या खोया ?क्या पाया?
    इस अनभूज पहेली को
    आज तक
    कोई ना सुलझा पाया
    कल क्या होगा
    ये तो वक़्त बताएगा ”
    अच्छी रचना

  4. जीवन के खेल वाकई अजब…

    उत्तम अभिव्यक्ति.

  5. धन्यवाद निशान्त जी,
    ज़िंदगी एक गीत है,गुनगुनाते जाइए
    खुशी हो या गम मुस्कुराते जाइए…

  6. माया जाल ही लुभाता सबको
    जो फंस गया ,उलझता गया
    समझने का भ्रम होता रहते
    निरंतर दिन पर दिन ज्यादा
    उलझता रहता

  7. आपकी हर टिप्पणी में राग है
    हर लेखनी आपकी पराग है…

  8. “पराग का मिठास
    निरंतर लुभाता
    जितना मीठा दिखता
    उतना है या नहीं
    चखने वाला ही जानता”

  9. एक छोटी सी कविता लिख दी
    पराग का मिठास निरंतर लुभाता
    पराग का मिठास
    निरंतर लुभाता
    हर जुबान को
    लपलपाता
    जितना मीठा
    दिखता
    उतना है या नहीं
    चखने वाला ही
    जानता
    बावक्त कड़वा
    निकलता
    आँखों में आँसू
    लाता
    जीवन की
    दर्शाता हकीकत
    20-07-2011
    1208-88-07-11

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