तुम जब याद आए बहुत याद आए


हाँ मैं नाराज़ हूँ तुमसे
सदा के लिए
क्यूँ मानू भला मैं
और किसके लिए
इक पल न सोचा तुमने
कैसे जिएंगे हम
इठला के चले गए
न ज़मीं पै हैं कदम
तुम चले गए तो क्या,
जी रहे हैं हम।
हमें गम है क्या गर
इतना तुम समझते
गहरी सूनी आँखों में न
कभी आँसू भरते
क्यूँ हर दिन सताते हो हमें
मुस्कुराता सा चेहरा दिखाते हो हमें
क्यूँ गए तुम हमसे कहीं दूर
हम यहाँ बेबस जीने को मजबूर
हो कहाँ तुम इक बार ये
बता दो
टूटे हुए हैं हम,न इतनी सजा दो
नम पलकों पे आके
नींदें सजा दो
इक बार तो मुझे
फ़िर से बुला दो।
तुम आओगे वापस यकीं है हमें,
कब आओगे लेकिन
इतना तो बता दो…

12 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

12 responses to “तुम जब याद आए बहुत याद आए

  1. कौन कहता है तुझे मैंने भुला रक्खा है
    तेरी यादों को कलेजे से लगा रक्खा है

    लब पे आहें भी नहीं आँख में आँसू भी नहीं
    दिल ने हर राज़ मुहब्बत का छुपा रक्खा है

    तूने जो दिल के अंधेरे में जलाया था कभी
    वो दिया आज भी सीने में जला रक्खा है

    देख जा आ के महकते हुये ज़ख़्मों की बहार
    मैंने अब तक तेरे गुलशन को सजा रक्खा है
    जाँ निसार अख्तर

  2. your poems inspire to write instant poems,keep it up
    best wishes
    “हम दूर गए ही कब
    जो लौटने की बात
    करते हो
    खामखाँ खुद को परेशान
    करते हो
    जरा दिल में प्यार से ढूंढो
    हम निरंतर वहाँ छुपे
    बैठे हैं “

  3. Durgesh

    कुछ खोज रहा था मैं, और अचानक आपकी कविता पर नजर चली गयी.
    बहुत उम्दा लिखा है आपने. ऐसा इसलिए नहीं कहा मैंने कि मैं कोई भावनाओ का जानकार हूँ, ऐसा इसीलिए कहा मैंने क्योंकि इसी लम्हे में मैं जी रहा हूँ.
    शुक्रिया इन ज़ज्बातों को शब्द देने के लिए.

  4. Honestly, one of the best hindi poems I read in recent times. Beautiful Indu 🙂
    The ultimate…

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