सत्ता का अधिकारी कौन


खोखली नींव के बीच
मजबूत दीवारें खोज़ते हैं हम
जिनका इतिवृत्त मालूम नहीं.
बाहर से रंगी ये दीवारें
आकर्षित कर लेती हैं
और हम बरबस ही
इन्हें सौंप देते हैं-सर्वस्व
धीरे-धीरे दीवारों का रंग
उतरता है
खोखलापन नज़र आता है
और तब रह जाते हैं आपके पास
खाली हाथ।
बिना नींव की इन दीवारों को
कब तक
ढोते रहेंगे,
जिस दिन ढहेंगी ये दीवारे
खुद भी ढह जायेंगे आप
ये तो फिर भी
नज़र आएंगी लेकिन,
स्वयं को नहीं खोज पाएंगे आप…

12 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

12 responses to “सत्ता का अधिकारी कौन

  1. rajtela1

    उम्दा
    चाहत इंसान को
    निरंतर मारती
    बेहतर की ख्वाइश
    झूँठी मुस्कान लुभाती
    नज़रें धोखा खाती

  2. कब तक
    ढोते रहेंगे,
    जिस दिन ढहेंगी ये दीवारे
    खुद भी ढह जायेंगे आप
    ये तो फिर भी
    नज़र आएंगी लेकिन,
    स्वयं को नहीं खोज पाएंगे आप

    बहुत खूब…..सार्थक रचना …बधाई….

    डा. रमा द्विवेदी

  3. mukta

    so true …… indu. really pata nahi kab tak dhote rahege…

  4. Sunita Kurup

    this is beautiful ya.. really nice.. well written 🙂 🙂 i am following u now

  5. tys

    saw ur blog thru indiblogger…thought u mite find this one interesting….its not mine but it too is a hindi blog …

    http://mathurakalauny.blogspot.com/

    iam afraid i cant really read and write the language but have appreciated some amazing works of it…cheers

  6. सच में, सुन्दर कगूरे मजबूत नीव पर ही बनते हैं!

  7. abtak aapki jitni bhi rachnain padhi hain unmain sabse acchi rachna mujhe ye lagi

    badhai

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