जो जितना व्यस्त उतना सफल


सुख-दुख,आना-जाना सब जीवन के पहलू हैं हर कोई ये जानता भी है और समझता भी।सच भी यही है कि जीवन के उतार-चढ़ाव के बीच तालमेल बनाए रखना चाहिए हर पल को आनंद से भर लेना चाहिए।कभी-कभी शायद सभी ने ऐसा महसूस किया ज़रूर होगा भले ही मात्र एक क्षण को जैसे खुशियाँ सारी पास हैं फिर भी कुछ तलाश है।कभी ऐसा भी लगता है कि आप चारों तरफ अपनों से उनके अपनत्व से घिरे हैं किंतु इतनी भीड़ के बावजूद भी कभी अकेलापन महसूस होता है।
जीवन में व्यस्तताएँ बहुत बढ़ गई हैं ऐसा लोग प्रायः कहते हैं किंतु क्या वास्तविकता यही है।थ्री-जी का जमाना है इधर सोचा उधर मिला,कार्य की तीव्रता इच्छाशक्ति समान हो गई है फिर व्यस्तता है कहाँ?परिवार के लिए समय नहीं,दोस्तों से भी संपर्क नहीं,ऑफिस के काम भी पैंडिग चल रहे है,फिर व्यस्त कहाँ हैं हम यही खबर नहीं।
शायद मन को व्यस्तता शब्द ने जकड़ लिया है बस।चारों तरफ एक भागमभाग मची हुई है कि कौन ज़्यादा व्यस्त है जितना ज़्यादा जिसने व्यस्त दिखा लिया स्वयं को उतना ही अधिक वो चर्चा में।जीवन में बड़ा कठिन
है बदलते समय से तालमेल बिठाना-बगैर किसी परेशानी के परेशान होने का ख़िताब पाना। जैसे पहले लोगों को उनकी योग्यतानुसार उपाधियों से नवाज़ा जाता था वैसे ही आज भी यह प्रथा जोर-शोर से फल-फूल रही है समय के साथ उपाधियों के नाम में परिवर्तन भर हो गया है मात्र, ये हमारी आज के युग की प्रसिद्ध उपाधियाँ हैं-बेचारा-बेचारी,हैरान-परेशान,व्यस्त,काम ही काम और न जाने क्या-क्या…
जीवन का आंनद लेना चाहिए शायद हमें यही सारे शब्द आनंदित कर देते हैं जब लोग कहते हैं हाँ-हाँ हम समझते हैं तुम्हें।चोट लगे बिना ही दवा-मरहम सब मिल रहा है,कितना आनंद आता है लोगों ने बेचारा कहा,परेशान कहा और व्यस्त भी कह दिया अब तो और भी बढ़िया-सोने पे सुहागा। कहावत भी कह डाली मन ही मन-हींग लगी न फिटकरी और रंग भी चोखा। दो पक्तिंया याद आ रही हैं बस-

हमेशा झूठ हम आपस में बोलते आए
न मेरे दिल में न तेरी जबाँ पे छाला है…

9 टिप्पणियाँ

Filed under अभिलेख

9 responses to “जो जितना व्यस्त उतना सफल

  1. rajtela1

    Success is in one’s mind,success for one may not be success for the other,it depends on the goal one sets,I feel end of the day,peace and contentment is the real success other than them ,everything else is endless desire ,even climbing mount everest or becoming ambani like may not satisfy one.
    Look at people amassing tons of wealth and are still crying for more

  2. भूल जाते हैं हम खुद को इस कृत्रिम व्यस्तता में । हम बुन लेते हैं अपने चारों ओर एक झूठा संसार और सारा समय खुद से दूर भागने में लगाते हैं ।आजकल सफलता के मंत्र हैं ” काम मत करिए काम का जिक्र करिए ” , व्यस्त रहो मत व्यस्त दिखो” । गलाकाट प्रतिस्पर्धा से दूषित इस भौतिकतावादी युग में मुखौटे का बड़ा महत्व है। इसके साथ ही अपना जीवन हम खुद ही जटिल बना लेते हैं और हम गैर जरूरी चीजों में व्यस्त रहते हैं । हम अपनी प्राथमिकताएँ समझ ही नहीं पाते और इसीलिए दुखी रहते हैं । अच्छी विचारोत्तेजक पोस्ट !!

  3. nice post . When we spend our lives in such a flurry of wanting we miss out on so much. its true, if we realize that we have enough,we are truly rich.

  4. very well written indu.. and I agree with Ravi Singh.. but just one question when do we know it is ‘enough’….demands just keep increasing right…first ur alone so 1000 is enough,,,then u marry so u need 2000,,,,then kids,,,,so on and so forth….So I think it is all in the mind just like Rajtela1 said…

  5. @sunita,the word ‘ Enough ‘ is not only for money, in this world we always search for more,like,latest electronic gizmos, new car, bigger house and off course more money thus always on run for never ending desire for more n MORE.and in this run we miss so much joy and treasure that we already have.If we take time and really look at what we have which many do not have with a heart of gratitude, then soon we will realize how rich we really are.

  6. Wo kehte hai ki aadhunik technology ne jeevan saral kar diya hai, kaam aasaan kar diye hai, kaam karne ke samay me giravat laayi hai. Kintu jo samay bacha hai, kya hum uska sadupayog kar rahe hai? The more simpler things get, the tougher it becomes. Nothing is ever enough:)

  7. very well ma`am, you write very well..such a well knit articles..

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