प्रकृति और इंसान


दीवारों पर परछाँई के रूप में
बादलों में प्रतिबिम्ब की तरह
अनेक प्रकार की आकृतियाँ
हम द्रष्टिगत करते हैं।
पर क्या
कभी सोचा है कि  बादलों में
चित्र का रूप भयानक क्यूँ है
एकाएक जवाब मिला कि
वहाँ भी इंसानों की परछाँई पड़ गई है।
चमकती हुई बिजली
जब हमें आतंकित करती है उस वक्त
वह हमारी ही जलन की
रोशनी होती है।
आँधी आती है और सब कुछ
नष्ट हो जाता है
यह आँधी भी कोई पराई नहीं
बल्कि मानवीय उच्च आकांक्षाओं की होड़ में
अप्राप्य चित्त की मात्र अभिव्यक्ति है।
परेशान होते हैं सब उस वक्त
जब आता है भूकम्प जबकि
समाज की कुण्ठित पीढ़ी प्रतिदिन
एक भूकम्प से ही गुजरती है।
जिये जा रहे हैं कि अब प्रकृति भी
रुख बदलने लगी है।
काश!
कि सोचा होता वो आज भी वही है
कुछ बदला है तो इंसान
और सिर्फ़ इंसान…

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7 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

7 responses to “प्रकृति और इंसान

  1. rajtela1

    कुछ बदला है तो इंसान
    बदला
    भूकंप आये या आंधी
    अब सिर्फ खुद की सोचता
    कोई मरे या जिए
    खुद जीना चाहता

  2. kaafi arse ke baad hindi kavita padhne ka avsar mila hai. hume ye vakya bahut pasand aaya
    “जिये जा रहे हैं कि अब प्रकृति भी
    रुख बदलने लगी है।”

  3. depalan

    staying in Bangalore with not much exposure to hindi reading this wonderful poem was refreshing
    saju depalan
    http://www.iseeebirds.blogspot.com

  4. sher singh

    प्रकृति और इंसान पर लिखी यह कविता अच्छी लगी इस तरह की और पढ्ने की इच्छा हो रही है निराश नही करोगी Thanks

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