रिश्तों की पीड़ा


ज़िंदगी को समझना गर है
मुश्किल बहुत
रिश्तों को समझना भी
आसां नहीं
चुपके से आते हैं रिश्ते भी
ज़िंदगी की तरह
सुख-दुख सब बटोर लाते हैं
किसी परिंदे की तरह।
ज़रा सी आँधी में उड़
जाते हैं वो
न फिर लौट वापस
आते हैं वो।
करते हम कोशिशें
बार-बार हज़ार
फिर भी दिलों में कहीं
रह ही जाता गुबार
जिंदगी तो फिर भी गले
लगाती है कई बार,
रिश्तों की पीड़ा का
न कोई परिवार…

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9 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

9 responses to “रिश्तों की पीड़ा

  1. rajtela1

    रिश्तों पर विराम लग गया,अहम् अब अहम् हो गया

    रिश्तों पर विराम
    लग गया
    अहम् अब अहम्
    हो गया
    कौन पहल करे
    सवाल खडा हो गया
    इक दूजे के जहन में
    दिन रात सवार हो गया
    दिलों में जहर भर गया
    निरंतर ध्यान दूजे का
    रहता
    किसे क्या कहाँ
    मालूम करता रहता
    मन किसी का चैन से
    ना रहता
    तिल का ताड़ बन गया
    सहयोग दोनों का रहा
    जो पहल करे
    वो छोटा हो गया
    इज्ज़त का सवाल
    हो गया
    अहम् जीत गया
    भाई चारा हार गया
    18-03-2011
    डा.राजेंद्र तेला”निरंतर”,अजमेर
    448—118-03-11

  2. rajtela1

    लोग रिश्तों के मायने ढूंढते हैं,अपने जहन से उन्हें देखते हैं

    लोग
    रिश्तों के मायने
    ढूंढते हैं
    अपने जहन से उन्हें
    देखते हैं
    हर रिश्ते को शक से
    देखते हैं
    जिस का जहन जैसा
    वैसा सोचते हैं
    निरंतर खुद से ज्यादा
    दूसरों को खोजते हैं
    हर रिश्ता पाक होता है
    नापाक इंसान खुद
    बनाता है
    जहन में क्या है
    दुनिया को बताता है
    खुद की नज़रों में गिरता है
    बेशर्मी से जीता है
    रास्ता दोजख का आसान
    करता है
    28-11-2010
    डा.राजेंद्र तेला”निरंतर”,अजमेर

  3. rajtela1

    I know too many but could not stop myself,please excuse
    नियामत खुदा की समझो रिश्तों को,पल पल जिओ रिश्तों को
    किस्मत
    वालों के बनते हैं
    रिश्ते
    बड़ी मुश्किल से
    निभते हैं रिश्ते
    नफरत ना ढूंढों उन में
    ना सोचो क्या मिलेगा
    उन में
    नफ़ा नुक्सान ना खोजो
    उन में
    रिश्तों में देना सीखो
    निस्वार्थ जो रखोगे
    रिश्ते को
    खुद ब खुद
    बहुत देंगे रिश्ते
    निरंतर प्यार से पालो
    रिश्तों को
    सम्मान से रखो
    रिश्तों को
    अहम् से दूर रखो
    रिश्तों को
    ना तोड़ो रिश्तों को
    नियामत खुदा की
    समझो रिश्तों को
    पल पल जिओ
    रिश्तों को
    17-12-2010

  4. प्रवीण पाण्डेय

    हर पल, खुल कर जियो। बहुत ही सुन्दर कविता।

  5. It’s very beautiful and real. I love the way you compared it with birds. Ending is stunning.

  6. पहली बार आपके ब्लॉग पर आया हूँ, आप बहुत सुन्दर लिखती है .. मेरी बधाई स्वीकार कीजिये .. इस कविता में रिश्तों की पीड़ा का वर्णन बहुत ही संतुलित शब्दों में किया है और ये शब्द जैसे के एक कथा कह रहे हो .. बधाई

    आभार
    विजय

    कृपया मेरी नयी कविता ” फूल, चाय और बारिश ” को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

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