नन्हें हाँथ


आज फिर दर्द का अहसास हुआ है
ये हादसा ज़िंदगी के साथ हुआ है
वो नन्हें से हाँथ हैं जो ओस की तरह
खुले हैं सामने इक चाँद की तरह
क्या दें इन्हें कि हम इंसाँ नहीं रहे
उन हाँथों की कोमलता निहारती है हमे
देखते हैं हम उन्हें मुश्किल भरी नज़र से
और पूछते हैं कि
क्यूँ करते नहीं कुछ काम
जवाब इसका वो देते नहीं ज़ुबाँ से
बोलती हैं आँखें और करती हैं सवाल
क्या दे सकेंगे आप ?
दे सकेंगे हमें बचपन का प्यार
ममता की छाँव वो आँचल का दुलार
नहीं दे सकेंगे आप हमें कुछ
दे दीजिये बस एक निवाले के लिए कुछ
इस तरह के हमसे न सवाल कीजिये
हाँथों की कोमलता का न मज़ाक कीजिये…

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19 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

19 responses to “नन्हें हाँथ

  1. Nice….Added your blog link to my blogroll and your latest post will always be visible in my blog.

    Sash

  2. I was taken back earlier.. im poor at hindi… but then i managed…
    it is wow!!! with a feel, cause everything…

  3. लगा जैसे विचार ठहर रहे थे और कलम कुछ कुछ रुक कर चल रही थी ,
    फिर भी बचपन की त्रासदी को अच्छी तरह व्यक्त करते हैं आपके भाव ,
    कम से कम बच्चों का ख्याल तो किया आपने
    क्या करूँ आदत खराब कर दी आपने ,जो दिल को महसूस हुआ कह दिया
    साफ़ गोई के लिए क्षमा ,आदत से मजबूर हूँ

  4. नन्हे हाथ अब
    नर्म नहीं रहे
    दो रोटी के लिए
    मिट्टी से सन गए
    जीने की मजबूरी में
    खुरदरे हो गए
    खेलने की उम्र में
    निरंतर कर्म में
    जुट गए
    सर्दी,गर्मी सब भूल कर
    वक़्त से पहले ही
    जीवन से मुखातिब
    हो गए

  5. प्रवीण पाण्डेय

    बचपन संतुलित रहेगा तो देश सुदृढ़ बनेगा।

  6. Very very nice thought and flow…. I think ‘abkhen bolti hain aur KARTI hain woh sawal may go better. I am definitely keep my one eye on your writing young lady:) Keep it up.

  7. शब्दों में भावनाएं खूब पिरो देते हो आप….
    लोग कहते हैं की कुछ लिखा है, पर मैं ये कहूँगा की लिखा नहीं हैं….
    बल्कि एक खाका खींच दिया है और उसमे कही गयी हर बात का दृश्य स्वयं को दिखलाता है….
    मार्मिक पहलू को छुआ है आपके शब्दों ने…. समझ ये नहीं आता के तारीफ करूँ या विचार….
    के आखिर हम हैं कहाँ…………….? सोचनीय सवाल है, है न…?

  8. धन्यवाद संजय जी,
    आखिर हम हैं कहाँ? विचारणीय सवाल है जिसका जवाब ही तो मिलता नहीं प्रायः

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