गौरव गाथा देश की


गौरव गाथा देश की
कितनी धुन सुनाए
सब कष्टों से निकल कर
आज हम मुस्काए
ऋषियों की ये तपोभूमि है
वीरों की ये कर्म भूमि
शहीदों की ये मात्र भूमि
दिल आज यही बस गाए
गौरव गाथा देश की…
नित रहा यहाँ देवी का वास
माताएँ करती उपवास
सारे धर्मों को आज़ादी है
वो करें अपने धर्मों में वास
गौरव गाथा देश की…
नदियाँ अति पावन हैं अपार
जिन्हें पूजते हैं हर प्रकार
चारों मौसम का है अंबार
जो देता नित नए उपहार
गौरव गाथा देश की…
नित नए छुए हम मुकाम
नौनिहालों का बस यही अरमान
हमारा देश हमारी शान
बढ़ाना है इसका अभिमान
गौरव गाथा देश की…

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5 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

5 responses to “गौरव गाथा देश की

  1. इंदुजी
    राष्ट्र के प्रति आपकी भावनाएं वंदनीय हैं …
    लेकिन सच में स्थिति संतोषजनक तो नहीं हैं

    मैंने लिखा है-

    बड़े बदरंग दिखते हैं मनाज़िर मुल्क में मेरे
    हुए हालात अब क़ाबू से बाहर मुल्क में मेरे

    चहकती बुलबुलें हरसू महकती थी हसीं कलियां
    वहीं पसरे हैं कांटे और अज़गर मुल्क में मेरे

    पूरी रचना के लिए उपरोक्त लिंक द्वारा मेरे ब्लॉग पर आइए न …

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

  2. प्रवीण पाण्डेय

    देश है तो हम भी हैं।

  3. atti sundar . apna desh mahan .. !
    aapko swatantra diwas ki shubkamnayen.

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