कभी-कभी कुछ समझ नहीं आता


कभी-कभी कुछ समझ नहीं आता
क्या है जीवन में किससे नाता
कुछ लोग हैं जो आपको,चाहें उम्र भर
लुटा दें सारा प्यार बिन माँगे आप पर
फ़िर भी हो आपको तलाश किसी की
जिसे आप चाहें,न मिल पाए उम्र भर
ग़र खुश हो तुम तो हम भी हैं खुश बहुत
कहते हुए ये,गला क्यूँ भर आता
अजब है दर्द जो समझ नहीं आता
पर इसका अहसास हरपल सताता
कभी-कभी कुछ समझ नहीं आता…

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27 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

27 responses to “कभी-कभी कुछ समझ नहीं आता

  1. ji haan indu ji . bilkul sacch .
    hum jo chaahte hai wo agar nahi mile to koi gam nahi
    bas dua hai ki wo khush rahen ….
    jeevan me kisase hamara kya naata hai , ye to hamen bhi nahi pata
    par jo log hamen itna pyar loota rahen hai , wo hamare liye kisi moti se kam nahi .
    anmol hai wo pyar …….. jiska koi mol nahi
    jeevan bhar mahekane wale phool .

  2. कुछ रिश्ते कभी न टूटते

    कुछ रिश्ते कभी न टूटते

    दिल की डोर से बंधे रहते

    मन के कोने में छुपे रहते

    दिमाग में कुलबुलाते रहते

    जिनसे रिश्ते वो चले जाते

    वक़्त की कब्र में दफ़न होते

    फिर भी यादों को निरंतर

    झंझोड़ते रहते

    चैन से ना रहने देते

    16-08-2011

    1369-91-08-11

  3. बहुत सुन्दर मनोभाव!

    और क्या आपको यह पता है कि ये पंक्तियाँ किसने लिखीं हैं?

    “जीवन क्या है, चलता फिरता एक खिलौना है,
    दो आँखों में एक से हँसना, एक से रोना है”.

  4. आपने इस पोस्ट के नीचे शायद अपने ब्लौगर वाले ब्लौग का लिंक भी शेयर किया है जिसकी आवश्यकता नहीं है. मेरे विचार से इस ब्लौग पर अपने विचारों को व्यक्त करना ठीक रहेगा. मुझे ब्लौगर और वर्डप्रेस दोनों का बढ़िया अनुभव है इसलिए मैं आपको वर्डप्रेस पर ही टिके रहने की सलाह दूंगा.

    कमेन्ट का जवाब देना वर्डप्रेस में सबसे आसान है. और मैं इसमें अपने फेसबुक या ट्विटर अकाउंट से भी कमेन्ट कर सकता हूँ. इसमें स्पैम कमेन्ट को आने से रोकने की सुविधा भी आसान है और कमेन्ट मॉडरेट करने के कई विकल्प हैं. आप जब चाहें मनपसंद थीम को आजमा कर देख सकते हैं और साइडबार में कई सारे विजेट्स लगा सकते हैं.

    वर्डप्रेस कुछ लोगों को इसलिए भी पसंद नहीं है क्योंकि यह जावास्क्रिप्ट आधारित कोड लगाने की अनुमति नहीं देता. इसी वजह से इसकी पोस्ट में आप बहुत सी चीज़ें एम्बेड नहीं कर सकते जो कि ब्लौगर में आसान है पर सच कहूं तो उतना कुछ करने की हमें ज़रुरत ही कहाँ है? हमें तो अपनी बात सीधे-सरल तरीके से रखनी है जो हम जब चाहे कर सकते हैं.

  5. प्रवीण पाण्डेय

    मन में संग्रह कर लें, कभी न कभी स्पष्ट होगा ही।

  6. भावनाओं को बड़ी ही कुशलता से पिरोया है, जीवन में ऐसे बहुत से पल आते हैं जब कुछ समझ ही नहीं आता|
    ‘अजब है दर्द जो समझ नहीं आता
    पर इसका अहसास हरपल सताता”…शानदार|

  7. समझ में गर आता,
    तो मैं यह कविता न पढ़ पाता|
    I liked a few poems. I wonder how can someone write poems unless they are drunk. or is it that you were?
    PS: It’s a personal perception. I can never write a poem unless alcohol flows through my blood 😛

  8. Very neat poem, Induji. I wish I could write in Hindi again like I used to a few year back even if they are filled with grammatical errors. But I’m thankful that I could still read and understand such beautiful lines as yours. 🙂

  9. Very nice……your style and language is such that you may benefit by reading Shailendra and Sahir, simple language great thoughts, although Sahir used a touch more Urdu. If you need recommendations, let me know. Good luck:)

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