गज़ब है ये विषय-भ्रष्टाचार


भ्रष्टाचारी बात कर रहे भ्रष्टाचार की
नित करते हम नये सवाल,नित ही पाते हैं जवाब
क्या खू़ब हो गर पूछें आज
है कौन बचा अपने में आप
शुरुवात कहीं से करनी है तो
पहले खु़द को ही झाँकें
उसे साफ़ करते ही,खुल जायेंगी सारी आँखें
हमें भी आता मज़ा बहुत है
करते काम वही सारे
होते हैं बदनाम जब नेता
हम हो जाते हैं बेचारे।
बुरा न बोलो,बुरा न देखो
न करो बुरे काम कभी
नित करते रहते हम ये सब
पर है ये हमें स्वीकार नहीं।
क्या खू़ब गज़ब की बातें होती
चर्चायें हर गलियों में
हम भी तो हैं शामिल होते,
उन्हीं जली मोमबत्तियों में
भ्रष्टाचारी बात कर रहे भ्रष्टाचार की…

26 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

26 responses to “गज़ब है ये विषय-भ्रष्टाचार

  1. भ्रष्टाचारी बात कर रहे भ्रष्टाचार की…
    chehre par chehre
    lagaa kar ghoom rahe
    ab unko pahchaan lo
    aslee chehraa ujgaar karo

  2. प्रवीण पाण्डेय

    गज़ब है, हर ओर छाया है।

  3. सुंदर कविता हालात का वास्तविक लेखा .रचना पढवाने के लिए आभार .

  4. mrityunjay

    दरअसल हिंदी कविता लिखना ऐसा है—
    कागज के समंदर में, कलम की नाव लेकर के।
    निकले हैं शहर की भीड़ में, हम गांव लेकर के।।

  5. हमें भी आता मज़ा बहुत है
    करते काम वही सारे
    होते हैं बदनाम जब नेता
    हम हो जाते हैं बेचारे।

    …. इंदु जी ! सही पकड़ा आपने (सबको)

  6. BAHUT BAHUT SUKRIYA JANADESH KO SACH BAT BATANE KE LIYE

    VANDE MATRAM

  7. समसामयिक विषय पर कविता लिखने के लिए बधाई….
    सच ही लिखा है आपने …अन्ना के आन्दोलन में जितने लोग शामिल हैं क्या वे सब दूध के धुले हैं ? आज हर तरफ हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार फैला है …..अगर यह इस आन्दोलन से समाप्त हो जाता है तब अन्ना गांधी जी से भी ज्यादा महान हो जाएगे ….हम सब अन्ना के इस महान संकल्प के लिए और उसकी सफलता के लिए इश्वर से प्रार्थना करते हैं …..अगर यही संकल्प हर व्यक्ति खुद के लिए ले ले तो बात बहुत आसान हो जाएगी …नारे लगाना बहुत आसान है पर खुद पर लागू करना बहुत कठिन…..जय हिंद …..

  8. Corruption starts from the root always and we are the common people promoting the corruption…If you stop giving and taking bribes then all will be automatically fine. But no, we just want politicians to be good

  9. १९४७….१९५०……२०११……….?

    घन घोर अँधेरा है यहाँ
    अँधेरे की आदत क्यूँ?

    सब नींद में है यहाँ
    आंखें बंद है क्यूँ?

    हम कोस रहे है यहाँ
    दोष देने की आदत क्यूँ?

    सन्नाटा है यहाँ
    ऐसी भीड़ के बिच क्यूँ?

    तू ही तो है आवाज़
    हल्ला मचा दे तू

    तू ही तो है जवाब
    गाँधी बन जा तू

    उठ, उठ तू, उठ देश
    ये देहली वाले उठेगें, उठेगें जरुर
    उठाना तो है अपने आपको यहाँ

    अंधेर है यहाँ, अन्ना,
    हम तेरे साथ है अन्ना

    जनक देसाई ०८-१४-२०११

  10. देख रे प्राणी, अंदर देख
    अंधेर है भीतर , फिरसे देख
    क्यूँ कोस रहा है देश परदेश
    तुने ही तो लिखा अपना लेख !

    जहाँ पे तो लाली छाई है
    सूरज की किरने आई है
    रात अँधेरी है अंदर,
    द्वेश ? तो तेरा अपना है

    शायद है रावण, राम भी तो है !
    डूबने वाले !! नाव भी तो है
    छोड़ उमीदे. ले ले भेख.
    फिरसे लिखले तू अपना लेख

    JOINT PROJECT AMONG: चिराग उपाध्याय, विपुल भट्ट, जनक देसाई

  11. रचना वर्तमान का प्रतिबिंब है

  12. भारत में रिश्वतखोरी व आरोप-प्रत्यारोप का दौर है। हमारे चारों ओर एक धुंध-सी छाई है। स्विट्जरलैंड के बैंक में भारतीय धन और भारतीय मंदिरों में धन, पांचसितारा साधु और निरंतर टालमटोल करते नेता, भ्रष्ट अवाम और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों में शामिल वही अवाम; किसको मुजरिम समझें, किसको दोष लगाएं।

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