लोकपाल बिलः मांगें उचित तरीका गलत


देश के मौजूदा हालात से सभी वाकिफ़ हैं क्योंकि शहर ही नहीं गाँव तक में अन्ना की जलाई मशाल खूब जल रही है मीडिया ने सभी को जागृत कर दिया है। अन्ना की भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग में हम सभी शामिल हैं किंतु क्या हमें ये पताहै कि जन लोक बिल है क्या? शायद काफी लोग जानते भी नहीं होंगें किंतु जैसे ही बात भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकने की आई हम सभी साथ हो लिये अन्ना के और सरकार को ही अपना सबसे बडा दुश्मन मान बैठे,सरकार की ही खिलाफत करने लगे हाँ सरकार ने एक गलती करी है अन्ना को गिरफ्तार करके जो कि कानूनी रूप से गलत है क्योंकि हमारे देश में किसी भी नागरिक को अभिव्यक्ति की आजादी सविंधान प्रदत्त मूल अधिकार है और अन्ना यही करने जा रहे थे –
आजादी केवल यही नहीं
अपनी सरकार बनाना है
आजादी है उसके खिलाफ
अपनी आवाज़ उठाना भी…

सरकार ने इस मूल अधिकार का अपहरण किया अन्ना को गिरफ्तार करके। हमारे देश मे कोई भी व्यक्ति अपना विरोध प्रकट कर सकता है बिना हिंसा किये हुए बशर्ते वो विरोध समाज के हितार्थ हो और अन्ना यही करने जा रहे थे जब सरकार ने उन्हे गिरफ्तार किया अतः सरकार ने कानून का उल्लंघन किया जिसकी जवाब देही सरकार को इस जन आंदोलन के रूप में मिल रही है।
अब हम बात करते हैं जन लोकपाल बिल की सबसे पहले हमें ये जान लेना चाहिये कि जन लोकपाल बिल के पास होने या न होने में कम से हमारे माननीय प्रधान मंत्री जी का कोई हाथ नहीं है जबकि हम उन्हीं पर दोषारोपड़ किये जा रहे हैं। देश में कोई भी कानून बनाने का हक किसी भी नागरिक या प्रधानमंत्री को नहीं है बल्कि जो भी मुद्दा हो उस पर हमें पहले लोक सभा व राज्य सभा दोनों ही जगह अपना प्रतिनिधि रखना होता है जो आपके सुझाव को सभी के समक्ष प्रस्तुत करता है उसके पश्चात यदि उस प्र्ताव पर लोक सभा व राज्य सभा दोनों से ही 2/3 का बहुमत हासिल होता है तब वो प्रस्ताव देश के राष्ट्रपति के पास भेजा जाता है ओर यदि राष्ट्रपति उस पर सहमति देकर अपने साइन कर देते हैं तो वह सविंधान में संशोधन कर के किसी कानून के रूप में लागू हो सकता है यदि राष्ट्रपति उस पर साइन नहीं करते तो वह कानून नहीं बन पाता है और पुनः सारी प्रक्रिया होती है किंतु यदि दूसरी बार भी वह प्रस्ताव लोक सभा व राज्य सभा से समर्थन पा जाता है तब राष्ट्रपति विवश होता है उसे स्वीकार करने के लिये,राष्ट्रपति को उसकी सहमति देनी ही पड़ती है। यह एक सही तरीका है किसी कानून को लागू करवाने के लिये जो कि अन्ना नहीं कर रहे,संविधान का सम्मान सर्वोपरि है।

आज पूरा देश व देश के जाने माने नेता भी उनके साथ है तो यह तो स्वीकार नहीं होगा कि संसद में उनका कोई प्रतिनिधि नहीं है या इन महा-महीषियों को सविंधान के नियमों का इतना भी ज्ञान नहीं है जो कि बारहवीं कक्षा में ही नागरिक शास्त्र विषय मे क्षात्रों को पढ़ाया जाता है। अन्ना के पास सविंधान विशेषज्ञों की एक टीम है अच्छा होता कि वो जनता से यह अपील करते कि प्रत्येक व्यक्ति अपने संसद सदस्य से आग्रह करे कि वे खुल कर अन्ना का समर्थन करें तो निश्चित रूप से इस अपील से आंदोलन को बल मिलेगा और जन लोकपाल बिल जल्द ही पास होगा ऐसा हमारा विश्वास है।
तमाम नामी-गिरामी हस्तियों ने भविष्य में होने वाले चुनावों में अपनी सीट पक्की करने हेतु अन्ना अनशन में अपनी हाजिरी लगानी शुरू कर दी है परन्तु कोई भी खुलकर यह नहीं कह रहा कि अन्ना द्वारा प्रस्तुत इस मसौदे पर हम अन्ना के साथ हैं।
कल तक हम भी यही सोच रहे थे कि इस दायरे मे प्रधानमंत्री व न्यायाधीशों को रखने पर आपत्ति है क्या? किंतु आज हमे इसका भी उत्तर समझ आ रहा है। प्रधानमंत्री तो देश के रक्षक हैं और जब वो हमारे ही सर्व मान्य सांसद के बहुमत से चुने जाते हैं फिर उनकी प्रतिष्ठा पर सवाल उठाना क्या उचित होगा! दूसरी मुख्य बात फिर तो हर कोई जिसके भी मन की न हुई वो प्रधानमंत्री के खिलाफ एक शिकायत पत्र दे देगा और जो भी कार्य वो कर रहे होंगे न सिर्फ रोक दिया जायेगा बल्कि जब तक उस पर कार्यवाही नहीं हो जाती वो दूसरे किसी कार्य को पूरा नहीं कर सकेंगे इस तरह तो देश में
प्रधानमंत्री पद सदा खाली ही बना रहेगा क्योंकि विरोधी पार्टियां,विरोधी लोग एक के बाद एक शिकायत पत्र देते ही रहेंगे और ये देश की प्रगति,प्रधानमंत्री पद की गरिमा उनके कार्यों सभी को ठप कर देगा,पतन की ओर ही ले जायेगा क्योंकि बजाय देश उन्नति के कार्यों के वो इसी में उलझे रह जायेंगे इसी तरह न्यायमूर्ति न्यायाधीशों के फैसलों की भी रोज ही अवमानना होगी क्योंकि जिसके भी पक्ष में निर्णय नहीं हुआ वही खड़ा हो जायेगा कि न्यायाधीश ने पैसे मांगे थे इस के खिलाफ सुनवाई की जाये। देश के गरिमामयी पद और इनके संचालक अपने मूल भूत कर्तव्यों को छोड़ इन्ही में उलझ कर रह जायेंगे…
अतः जन लोकपाल बिल को एक संवैधानिक रूप से पास कराने की जरूरत है और साथ ही देश की गरिमा एवं प्रगति के लिये कुछ अनावश्यक मांगो पर भी विचार किया जाना चाहिए। अन्ना की उचित मांगों पर संवैधानिक रूप से हम अन्ना का समर्थन करते हैं। कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं-

आग कोई फिर दहकने जा रही है
नौजवानी फिर बहकने जा रही है
हद हुई,दिल्ली!सुनो ललकार अन्ना की
नौजवानी फिर नये इतिहास रचने जा रही है।

अन्ना के लिये सोहन लाल द्विवेदी जी की दो पंक्तियां सादर-

“चल पड़े जिधर दो डग मग में
चल पड़े कोटि पग उसी ओर”

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20 टिप्पणियाँ

Filed under अभिलेख

20 responses to “लोकपाल बिलः मांगें उचित तरीका गलत

  1. प्रवीण पाण्डेय

    गहन चिन्तनपरक लेख।

  2. इतना अधिक तो मैं सोच ही नहीं पाता 🙂

  3. DEEPAK NARESH

    बेहद सुचिंतित..शोधपरक लेख.. साधुवाद

  4. सभी के मन में यह तो है कि यह लोकपाल निरंकुश न निकल जाये।
    असल में आर.टी.आई. को ले कर भी यह आशंका थी कि यह हथियार तो सरकारी काम काज ठप कर देगा। शुरू में कुछ जोश में लोगों व सरकारी कर्मियों ने गलतियां की भीं। पर अब काफी संयत व्यवहार आता जा रहा है।
    ऐसा ही लोक पाल के विषय में होगा। यह बिल जल्दी पारित होना चाहिये।

  5. ऐसा तो नहीं कि आम मानस में…वर्तमान के हालात को देखते हुए…लोकतंत्र और संविधान की अपर्याप्तता…इनसे परे निकलने की… अधिक उचित विकल्प तलाशने की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है…

    बेहतर…

  6. very well written and sach mein itihas dohrane wali kranti aayi,suno dilli!

  7. Thats what I am telling all since a long time. Blackmailing someone for any right or wrong cause is always wrong…..And there is guarantee that bill developed by the Anna Team is flawless but common public dont understand this.

    By the way, here is my IndiVine post. Check it and if you like it then please Promote it too there on IndiVine.

    http://www.indiblogger.in/indipost.php?post=72607

    Thanks 🙂

  8. आज आवश्यकता है सभी मुद्दों पर गंभीरता से सोक कर निर्णय लेने की । बहुत अच्छा लेख …

  9. Rajni has almost become synonymous with the word Original, because of the way he has portrayed it in every move he makes. Taking this a step further, Rajni now talks about being original and how it pays in the long run. Find out more on how he goes about it by clicking here http://bit.ly/n9GwsR

  10. There are plenty of reforms needed in our society and system to eradicate corruption. The lokpal bill will be just an initial efforts to being with..Any bill can me modified when needed. The govt must take a stand and pass the bill with proper hearing and debate.

  11. Durga Prasad Gaur

    आपने सोच को शब्‍दो मे व्‍यक्‍त किया हार्दिक आभार

  12. nitin

    आप के विचार देखे , सही है पर अन्ना के तरीके में बुराई है तो फिर गाँधी जी का तरीका भी बुरा था , भगत सिंह को तो फिर हमें आतंकवादी मानना चाहिये क्यों की उसने संसद पर हमला किया था , एक बात जो सबसे जरुरी है वो ये की देश का संविधान जनता के लिए बना है जनता संविधान के लिए नहीं बनी , लोकतंत्र का मतलब “जनता का, जनता द्वारा, और जनता के लिए” होता है, ना की “संसद का, संसद द्वारा, और सांसदों के लिए ” नहीं फिर संसद जनता की भावनाओ से उपर कसे हो सकती है भारतीय संविधान के चोथे भाग में भी यही लिखा है की संसद नीति निर्माण में जन भावना और जन हित का धयान रखेगी , अगर संसद सच में लोकपाल पर गंभीर होती तो 42 साल से अटका नहीं रहता , वाजपेयी सरकार में प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे में था तो वर्तमान बिल में बाहर क्यों निकाल दिया गया , एक संसद होने के नाते प्रधानमंत्री अपने पद को भी लोकपाल के दायरे में लाने का सुझाव दे सकते है , पर वो चुप है ,मन में चोर है तभी ना , और आज जब अन्ना जी जसे इंसान इस बुराई से लड़ने के लिए आवाज निकाल रहा है तो उस का विरोध हो रहा है

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