द्वापर या कलयुग


आज यूँ ही अचानक अपने स्कूल के दिनों की याद आ रही थी और तभी याद आई एक कहानी जो किस कक्षा में पढ़ी थी यह तो याद नहीं किंतु उस कहानी नें या यूँ कहें कि उस यथार्थ नें उस बचपन को भी झकझोर दिया था
हालांकि तब इतनी समझ कहाँ थी कि कहानी के मर्म तक पहुंच पाते। कहानी की मुख्य पात्र थीं पन्नाधाय। ऐसा हम इसलिये कह रहे हैं क्योंकि आज हमें सिर्फ वही कहानी की मुख्य किरदार नज़र आ रही हैं। पन्नाधाय जो कि राजघराने की एक मामूली सी नौकरानी थीं और उन्होंने राष्ट्र हित के लिये,राज्य के भविष्य के राजा के लिये अपने स्वयं के बेटे की हत्या करवा दी थी ताकि राष्ट्र बचा रहे और राष्ट्र मान से बढ़ कर कुछ नहीं… ऐसी कुर्बानी जिसे सुनकर,पढ़कर देश भक्ति की सारी परिभाषायें भी खामोश हो नत मस्तक हो जाती हैं मां का ऐसा त्याग देख कर। जो देश हितार्थ अपने ही पुत्र को … राष्ट्र नायक के लिये पुत्र से बड़ी कुर्बानी कोई हो नहीं सकती। किंतु आज पन्नाधाय का नाम चंद लोगों को ही याद होगा। अब हम बात करते हैं द्वापर युग के वसुदेव की जो अपने पुत्र की प्राण रक्षा के लिये यशोदा की बेटी को रात के अंधेरे में उठा लाये थे उस समय यह घोर अपराध करते हए उनके हाथ क्यों नहीं कांपे,क्या यह मानवता है! कि अपने पुत्र की रक्षा के लिये किसी और की पुत्री को हत्या कराने के लिये उठा लें। जब भविष्य वाणी हो ही चुकी थी कि यही पुत्र कंस का वध करके राष्ट्र नायक बनेगा फिर भला उसका कोई बाल बांकां कैसे कर सकता था कि वसुदेव नें मानवता को ही कुचल डाला। अपने पुत्र की रक्षा के लिये द्वापर का ये आदर्श है जबकि कलयुग का उदाहरण है कि पन्नाधाय ने राष्ट्र के लिये अपने पुत्र को कुर्बान कर दिया।
द्वापर में वसुदेव जैसे पिता हैं और कलयुग में पन्नाधाय जैसी मां। वसुदेव राज घराने के थे अतः उनका अक्षम्य अपराध किसी ने नहीं देखा और पन्ना क्योंकि एक नौकरानी थी अतः उनकी अतुल्य कुर्बानी भी नज़र अंदाज ही रह गई…

21 टिप्पणियाँ

Filed under अभिलेख

21 responses to “द्वापर या कलयुग

  1. Biggest sacrifice ever, I think humanity still exists, no matter which yug you live in.

  2. प्रवीण पाण्डेय

    पन्ना धाय का त्याग बहुत बड़ा था।

  3. DEEPAK NARESH

    Brilliant.. God bless you.. keep writing….
    Deepak N

  4. rajtela1

    written nicely but request you to work on your strength i.e.poetry that shall help u reaching greater heights.There is lot of honesty in your poetry and it seems as if coming straight from your heart.though advice should not be given until not sought for but aadat se mazboor hoon ,could not help myself.Excuse me for the same

  5. geetedu

    इंदु जी सबसे पहले इस आलेख के लिए मेरी ढेर सारी बधाइयां, पन्ना का त्याग तो अद्भुत है ही, लेकिन जिस तरह से आपने इसकी तुलना द्वापर से की, कई बातें सोचने पर मजबूर करता है और कहीं ना कहीं नारी शक्ति की सर्वोच्चता को सिद्ध भी करता है. पुन: इस विषय को एक नयी दृष्टि देने के लिए साधुवाद!

  6. sahi kaha aapne…….behad acchi lagi apki drishti jo do alag alag kaal chakr mein ghati ghatnao ka tultnatmak vishleshan kar gayi…

    aise hi likhte rahiye…

  7. यूँ ही कभी कभी अच्छासा कुछ हिंदी में पढने का जी करता है तो आपके ब्लॉग की तरफ रुख कर लेता हूँ, आज तक कभी निराश नहीं हुआ:) द्वापर और कलियुग लेख बहुत पसंद आया…. वैसे बहुत कम लोग जानते हैं की जिस दिन कृष्ण का जन्म हुआ था, उसी दिन जंगल में अर्जुन का भी जन्म हुआ था:)

  8. pradeep singh

    itni marmik tathya apko kaise pata chalta h,iska srot hme batayenge. aur apne rashtra ki shiksha pranali k bare me ku6 batayenge

  9. d p mathur

    aaj first time aapka blog dekha h, such lagta h aapki soch kuch different h. aapne toh sochne ka anddaj hi change kar diya. thanks

  10. You have made an interesting comparison between a mythological story full of miracles with a historical event that itself is wrapped in myths. While I understand the point you are trying to make, we should keep in mind that the authors were not sacrificing the girl child who was not destined to die. When Kansa snatched the child and hurled her against the prison wall, she flew up and appeared in the sky as a Goddess with eight arms, each arm carrying a weapon. She said, “O evil king! You will gain nothing by killing me. The one who will destroy you is elsewhere.” Then the Goddess disappeared. And according to the story, Vasudev was only following the instructions, hardly acting on his will, when he transported baby Krishna out of the prison when the guards fell asleep, prison doors opened, river parted etc.

    http://www.sanatan.org/en/campaigns/KJ/birth.htm

  11. कल 23/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

  12. एक नयी सोच को कहता लेख …वैसे राजघरानों के न जाने कितने और कैसे राज़ हुआ करते थे .. पन्ना धाय का बलिदान अतुलनीय है

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