आज की सुबह


आज की सुबह कुछ खास तो नहीं
फिर भी था इंतजार सुबह होने का
न आए फिर कभी इतनी लम्बी रात
आओ छोड़ दें गहरी निद्रा का साथ
है सुबह नयी है दौर ये नया
नये हौसलों का फिर जन्म है हुआ
उम्मीदों को अपनी जगाना है अब
इक नया इतिहास बनाना है अब
है लंबा सफर न घबराना तुम
गुजरी हुई रात में फिर न जाना तुम
आज की सुबह साफ है बहुत
नये हौसलों का अहसास है बहुत
शायद तभी था इंतज़ार,सुबह का
इस रोशनी में जीना कुछ खास है
आज की सुबह इक नया आगाज़ है…

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10 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

10 responses to “आज की सुबह

  1. प्रवीण पाण्डेय

    दिन को आज मिली बढ़त है।

  2. वही घास है, वही ओस है, वही मैं हूँ, वही लोग हैं,
    फिर भी आज क्यों कुछ नया सा लगता है…

  3. rajtela1

    bahut uttam ,aaj phir achhaa lagaa padh kar
    हर सुबह आस जगी,हर शाम वैसी ही ढली

    मौसम बदले
    ऋतुएं बदली
    मसले बदले,
    तारीख बदली
    हसरत हमारी नहीं
    बदली
    पाने की तमन्ना
    बढ़ती गयी
    उम्र ढल गयी
    चाहत ना बदली
    सीने में आग
    अब भी दबी
    निरंतर उम्मीद में
    ज़िन्दगी कटी
    हर सुबह आस
    जगी
    हर शाम वैसी
    ही ढली
    29-12-2010

  4. Oh yes surely every morning brings in new hopes, very well written indu 🙂

  5. भावों का शब्दों के संग अद्भुत संगम

  6. आपने यह २८ अगस्त को लिखा है जिस दिन अन्ना ने अपना उपवास तोड़ा| तो नयी सुबह की शुरूआत तो होनी ही थी| सुन्दर कविता|
    -हितेन्द्र

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