तुम्हारी याद भी हमदम


तुम्हारी याद भी हमदम
हमें हर पल सताती है
तुम्हारी चाह भी हमदम
हमें हर पल रुलाती है
तुम्हारे प्यार की खुशबू
ये सांसें चल ही जाती हैं
तुम्हारी सांसों की गरमी
हमें पिघला ही जाती है
तुम्हारी धड़कन की आवाज़
रूह में समा ही जाती है
क्यूँ इतना याद आते हो
जब कि हो नहीं तुम दूर
फिर भी प्यार बन कर तुम
हमें हर पल लुभाते हो
तुम्हारे हम सदा से हैं
यही धुन गुनगुनाती है
हमारे दिल की धड़कन भी
तुम्हे पहचान जाती है
कभी खुद से पूछना हमदम
धड़कन नाम किसका बताती है…

20 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

20 responses to “तुम्हारी याद भी हमदम

  1. rajtela1

    memories are endless, pleasant reading
    ना अब
    मिलना होता
    ना बात कभी होती
    मगर दिल में अब
    भी बसी
    याद उनकीअब भी आती
    जलजला जहन में
    पैदा करती
    बीते कल में लौटाती

  2. प्रवीण पाण्डेय

    कोमल अभिव्यक्ति।

  3. भावों की बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति ….

  4. svatantra nagrik

    तुम्हारी चाह भी हमदम
    हमें हर पल रुलाती है
    शायद यही नियति होती है…
    यदि मीडिया और ब्लॉग जगत में अन्ना हजारे के समाचारों की एकरसता से ऊब गए हों तो कृपया मन को झकझोरने वाले मौलिक, विचारोत्तेजक आलेख हेतु पढ़ें
    अन्ना हजारे के बहाने …… आत्म मंथन http://sachin-why-bharat-ratna.blogspot.com/2011/08/blog-post_24.html

  5. awasome prastuti indu……..
    dil phir se anand se bhar gaya . ati sudar komal bhavnayen .

    “THUMHARI YAAD ME ” maine bhi ek poem likhi hai shayad aapko pasand aaye …….!

  6. Deepak N

    इंदु जी..आपकी पहली दो पंक्तियां अद्भुत हैं.. किंतु भावों को सपाट तरीके से व्यंजित करने के बजाय उन्हें थोड़ा वक्तोक्ति में ढाल कर प्रस्तुत करने का प्रयास करें.. कविता का सौन्दर्य कई गुना बढ़ जाएगा.. मिसाल के तौर पर आपके भावों को आगे बढ़ा रहा हूं… इसे देखिए.. एक अच्छे रचनाकार के लिए अपनी कविता का परिवेश गढ़ना बेहद जरूरी होता है.. बेहद सुंदर ब्लॉग है..इसकी प्रविष्टियों को एक पेशेवर नजरिये के साथ प्रस्तुत करिए.. क्योंकि पाठक वर्ग रचनाकार को उसकी रचना के माध्यम से ही पहचानना पसंद करता है.. प्रयास सराहनीय है…..साधुवाद

    तुम्हारी याद भी हमदम
    हमें हर पल सताती है
    कि यादें हैं…ख्वाबों के
    घरौंदे भी उजाले है…
    जहां तुम हो..रोशन है
    जहां.. हम है बस साये हैं..
    सफर पर चांद जो निकला
    तो संगी सब सितारे हैं
    जो बूझो हमसफर माने
    जो हारो तो तुम्हारे हैं..
    जो मौसम..फूल का झरना
    तो बासंती महक फैले
    जो पलकों की मसक पा ले
    तो सावन की बलाएं हैं..
    यहीं से हर फसाना हैं
    यही सब के फसाने हैं..
    कहीं तुम अपना कहते हो
    कहीं हम अपना माने हैं
    जो ओठों पे बहक आती
    कहे बिन सुन ली जाती है
    वहीं बस तुम हमारे हो
    वहीं बस हम तुम्हारे हैं
    सफर में मुंतजिर है जो
    उन्हें किस्सा सुनाती है
    तुम्हारी याद भी हमदम
    हमें हर पल सताती है
    —— ——– —–
    तुम्हारी याद भी हमदम
    हमें हर पल सताती है

    • धन्यवाद दीपक जी,आपकी रचना बहुत ही सुंदर है आपके सुझाव का स्वागत है…
      हमारे भाव जिस रूप में उमड़ते हैं वैसे ही लिख जाते हैं किंतु आपके सुझाव पर ध्यान अवश्य देंगे…
      आपका ह्रदयाभार…

  7. न जाने इस याद में क्‍या खास है,

    जो आती है तो सांसे थम ही जाती हैं।

  8. bhuit achha likha ha apne…… prem ka ek darpan…. dikhaya ha.. sabdon m……..

    Na jane kyon wo mere dil ke karib rahtain hain,
    khushi mai na sahi par gum mai sharik rahtain han,

    Meellon ki duriyon ko maine kab mana hai
    ek tarfa mohabbat mai bhi to kuch fakeer rahtain hain,

    Wo hamari yadon mai aate hain yahi bahut hai
    aise bhi kahan sab ke nasib rahte hain……….

  9. Your Poem is really full of touching words and memories.
    I wish you all the best!!

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