दीवारें भी बोलती हैं


बंद कमरे में खिड़की के पास
सींखचों से झांकती नज़र
देखती है बाहर
दिखता है कुछ साफ तो कुछ धुंधला सा
खिड़की पर लगी लोहे की छड़ियां,
रुकावट बन रही हैं
पुनः नज़र वापस कमरे में
वही बंद कमरा,वही खामोश दीवारें!
चारों तरफ दौड़ती है नज़र
चाहती है कुछ पूछना
कुछ कहना
पर कमरे में कोई नहीं
तब दीवारें ही तोड़ती हैं-अपना मूकपन
कहती हैं,एकांत का ये क्षण
कर लो अपना मन्थन
निष्पक्ष भाव से
फिर जो प्रश्न उठें तुम्हारे मन में
परिप्रेक्ष्य में उनके-
पूछना तुम हमसे
मिलेगा जवाब इसी खा़मोशी में तुम्हे
क्योंकि दीवारें
खा़मोश नहीं होती,मौन रहती हैं
और-प्रतिक्षण मौन से भी कुछ संदेश
संचरित होते हैं…

8 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

8 responses to “दीवारें भी बोलती हैं

  1. Alpesh Arya

    बहुत गहरी अनुभूति है
    अन्तः करण की

  2. प्रवीण पाण्डेय

    आप प्रश्न पूछिये, न जाने कितनी चीजें बोल पड़ेंगी।

  3. bahut khoob
    vaise khamoshi bhi bolti hai , baas samajhna aana chahiye .
    maun bhi saab khuch kah jata hai .

  4. alok

    Deevaron me chupa hai itihas sadiyon ka, salon ka, maheeno ka,
    Deevaro ne dekhe hain, karname bade – bado ke..
    bahut kuch dekha hai. khas kar mahlon ki deevaro ne-kilon ki deevaro. ne.
    aur.. karagaron ki deevaro ne………..

    Good thoughts……….Innovative……..

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