जीवन है बना उनके लिए कुरूप


हर रोज़ ही दिखते हैं
जीवन के रूप
हर रोज़ ही लगते हैं
वो कितने कुरूप
हम सोते हैं बंद कमरो में जब
बाहर बिखरे होते हैं,
जाने कितने ही सच।
न ठण्ड की सिकुड़न,न गरमी की ताप
बारिश भी उन्हें,लगती नहीं अभिशाप।
जिंदा हैं वो,ये जानते हैं हम
उन्हे नहीं अहसास! है यही गम।
गंदे हैं वो,हाँ चोर हैं वो
भिखारी ही नहीं,नशाखोर हैं वो।
न जाने हमने कितने,हैं पाले भरम
नहीं देख पाते कभी उनका मरम।
रहते हैं बंद गाड़ी,बंद कमरो में हम
बंद है आत्मा और नज़र भी बंद।
हैं निर्वस्त्र मन से,पर देखते उन्हें
वो सूखा बदन,वो देह ताप धूप
जीवन ने दिया है उन्हे ये रूप।
वो क्या हैं ये तो जाना नहीं मगर
यूँ ही कट जाएगा उनका सफ़र
न चाहत है कोई न कोई है भूख
जीवन है बना उनके लिए कुरूप…

19 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

19 responses to “जीवन है बना उनके लिए कुरूप

  1. आपकी खूबसूरत नयी रचना के लिए बधायी

  2. बहुत सही कहा इंदु जी , बधाई , ये सच्चाई बहुत कम ही समझ पाते है , जीवन हो जिसके लिए सुन्दर वो भला कुरूप को क्या समझ पाते है

  3. रहते हैं बंद गाड़ी,बंद कमरो में हम
    बंद है आत्मा और नज़र भी बंद।

    pahli baar apki rachna padi bahut achcha likhti hai aap, likhti raha dhanywaad itni achi rachna likhne ke liye or hume padane ke liye

  4. इंदु जी ,यह एक सच्चाई है ,जो कुछ लोगों को ही दिखाई देती है ,नही तो जो आप कह रहीं है वही हकीकत है ..बहुत मार्मिक वर्णन ..बधाई

  5. रचना पसंद करने एवं अपनी अमूल्य टिप्पणियाँ देने के लिए आप सभी का दिल से आभार।
    सदा ही आप सभी की शुभकामनाओं की प्रतीक्षा रहती है,रहेगी…

  6. बेहद मर्मस्पर्शी रचना, इस कविता के लिए साधूवाद स्वीकार करें…

  7. रचना पसंद करने एवं अपनी अमूल्य टिप्पणियाँ देने के लिए आप सभी का दिल से आभार।
    सदा ही आप सभी की शुभकामनाओं की प्रतीक्षा रहती है,रहेगी…

  8. Bhushan Shirgaonkar

    मैं कवी तो नहीं
    पर आपका ब्लॉग पढ़के
    कविता याद आ गयी
    शुभ नवरात्रि इंदुजी

  9. जीवन सचमुच कुरूप बन गया है उनके लिये । काश हम सब इस बात को महसूस करते ।

  10. दिल को छू लिया आपके कविता ने ,वाह .. वाह शब्द बोले मेरे मुख ने |
    छपी पहली मेरी कविता देखी आप ने , बार-बार आयेंगे आपको पढने |
    धन्यवाद |

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