कभी-कभी


कुछ अजीब सा खालीपन
लगता है कभी-कभी
न कोई है अपना कहीं
दर्द होता है कभी-कभी
रिश्तों से कभी भरता नहीं ये अधूरापन
इन सबके बीच महसूस होता है कभी-कभी
क्या सोचते हैं,और क्यूं हैं भला
जी बताना भी नहीं चाहता है कभी-कभी
खुश हैं हम सम्पन्न भी,फिर क्यूं
गहरे दर्द कहीं उठता है कभी-कभी
बंद आँखों के भीतर हैं सपने छुपे
उन सपनों की नमी मे,सीलता है मन कभी-कभी
क्या चाहत,क्या हसरत इन सबके बीच
कुछ अजीब सा खालीपन लगता है कभी-कभी…

24 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

24 responses to “कभी-कभी

  1. “मन सहारों के बीच सहारा ढूंढता
    कभी कोई पराया भी अपना बनता
    रोने को कंधा देता कभी कभी ……..

    सदा की तरह ,इंदुजी आपकी कलम से ज़ज्बात उन्ड़ेलती हुयी ,सत्य दर्शाती हुयी पंक्तियाँ

  2. मन का खालीपन ही देता है नयी चेतनाओ को जन्म ,
    फिर निकलते है निकलते है शब्द कलम के संग …….!
    कुछ अजीब सा खालीपन…………..

  3. मद्धम साँसों की बस्ती में ,
    ये खालीपन परिणाम बने
    खेतों की क्यारी में घुल कर
    उसरता की पहचान बने
    जब पसरे मरघट पर कभी तो
    उपमा फिर ये परिधान बने
    पर जज्बा बन दिल में उतरे
    कर्मठ विशुद्ध संग्राम बने
    ये खालीपन जयगान बने
    जन्गान बने मंगान बने …

    बहुत जटिल सा भाव है है ये खालीपन…पर कभी कभी बड़ा अपना सा लगता है … 🙂

  4. बहुत ही अच्छी भावों से भरी हुई पंक्तियाँ है, लगता है जेसे कही अकेले मैं, अंतरात्मा से बात करते हुए लिखी है, बहुत खूब

  5. “रिश्तों से कभी भरता नहीं ये अधूरापन”

    यह पंक्ति सबसे अच्छी और सच्ची लगी|
    अकेले आये थे अकेले जाना है|
    यही अकेलापन सत्य है|
    इसलिए शायद जब बाहर देखो तो खालीपन लगता है कभी-कभी!
    -हितेन्द्र

  6. Dear Indu,

    Your poem portraits the truth. Sometimes amidst of all the crowd of near n dear ones, the heart is lonely. This is life. Kahi par chupa koi gam kabhi bhi aa khada hota hai samne aur cheekh cheekh kar hame kar deta hai khali!

    Take care.
    Shaifali

  7. आपने मेरे भावों को ही मानों शब्द दे दिए हैं।
    बहुत सुंदर!

  8. इंदु जी नमस्ते!
    सब कुछ होते हुए भी मन मचलता है…कभी कभी 🙂
    बहुत ही प्यारी प्रस्तुति ….

  9. बहुत सुंदर रचना !
    बंद आँखों के भीतर हैं सपने छुपे
    उन सपनों की नमी मे,सीलता है मन कभी-कभी
    क्या चाहत,क्या हसरत इन सबके बीच………………

  10. इतनी प्यारी,आत्मीयता से भरी आपको लोगों की प्रतिक्रयाएं सदा हमें संबल प्रदान करती हैं….
    ह्रदयाभार…

  11. जब जब मस्तिष्क जयी होता,
    संसार ज्ञान से चलता है|
    शीतलता की है राह ह्रदय,
    तू यह संवाद सुनाता चल|

    बहुत अच्छी कविता है इंदु जी |

  12. “बंद आँखों के भीतर हैं सपने छुपे
    उन सपनों की नमी मे,सीलता है मन कभी-कभी”

    कुछ अपनी सी लगती हुई भावनाएं… बहुत सुन्दर अभिव्यक्ती।

  13. उन सपनों की नमी मे,सीलता है मन कभी-कभी
    क्या चाहत,क्या हसरत इन सबके बीच
    कुछ अजीब सा खालीपन लगता है कभी-कभी…
    इंदु जी ,बहुत सच पर इसी खालीपन को भरने की तलाश निरंतर जारी रहती है ..इसी को ज़िंदगी कहते है …बधाई ….

  14. “बंद आँखों के भीतर हैं सपने छुपे
    उन सपनों की नमी मे,सीलता है मन कभी-कभी” बेहद खूबसूरत. हम हमेश कहते हैं सपने आँखों में बसे होते हैं. मेरे आँखों का ओपरेशन हुआ तो पता चला यह झूट है.

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