गाँव की तरक्की


गाँव की तरक्की में
गाँव, अब गाँव न रहे
हैं वहाँ भी सड़कें,गलियों की जगह
हैं वहाँ भी घर पक्के,अब कच्चे न रहे
गाँव के बच्चे भी स्कूल जा रहे,पर
वहाँ की मूल भाषा ही भूल रहे।
ले ली जगह,वहाँ भी विदेशी खाने ने
देसी खाना नहीं अब,किसी दावत खाने मे।
तरक्की है ये गाँव की या
सभ्यता का अंत,
काका,दादा जैसे रिश्तों का
अब रहा नहीं दंभ!
छूठ छलावा इतना है बढ़ा
जिसमें हर शख्स,है सना पड़ा
सरकारी अभियान नित नए हैं गाँव में
क्या सच में तरक्की हो रही गाँव में…

Advertisements

22 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

22 responses to “गाँव की तरक्की

  1. “तरक्की के नाम पर
    लुट रही है
    सभ्यता की अस्मत
    रिश्ते तार हो रहे हैं
    गाँव बन रहे अस्तबल
    शहर गाँव के बीच में
    फँस गए
    ना घर के रहे ना घाट के”
    नया सोच ,लीक से हट कर ,सलाम…

  2. बहुत सही इंदु जी . ये सही है की आजकल सरकार ने गाँव का रुख किया पर . सच्चाई उतनी नहीं जितनी दिखाई जाती है . तरक्की के नाम पे सिर्फ वादा ही ज्यादा किया जाता है

  3. गाँवों में अब कहाँ रही गाँवों वाली बात।

  4. और् आप् देखियेगा कि सन् 2050 मे भी राजनीतिक् दल् गाँव्-गाँव् बिजली पानी सड्क् के नाम् पर् ही वोट् माँगेगे !

  5. वाकई … | ऐसा ही होता है | क्या इसे तरक्की कहे या अधोगति यही समझ मे नहीं आता | गहरी विचार से भरी कविता | धन्यवाद |

  6. इंदु जी ,आप विचार कविता अच्छी लिखती हो पर अपनी प्रस्तुति को और भी तराश सकती हो अन्यथा न ले …आपसे कुछ आत्मीयता महसूस होती है बस इसीलिए कह दिया …सस्नेह आशीर्वाद …..

  7. गाँव में नहीं रही, वो बरगद की छांव,
    जहाँ पत्ते के साथ पड़ता था हमारा पड़ाव !

  8. वो एक अपनत्व जो गाँव के किसी भी घर में जाने पर मिलता था… उसकी जगह अब शहरी औपचारिकता ने ले ली है, भाषा में अब रूखापन सा आ गया है…बच्चे अब कंचे और गिल्ली डंडा नहीं खेलते, मोबाइल गेम्स और टेलिविज़न से चिपके रहते हैं।
    पहले लगता था की अपने गाँव आये हैं हम….अब लगता है की बस अपने गाँव वाले घर आये हैं हम।

  9. बहुत खूब इंदु जी…गाँव में आज की स्थिति का बहुत अच्छा चित्र खींचा है…कहीं न कहीं असली हिन्दुस्तान आज भी गाँव में जिंदा है..अपने आदर्शों और संस्कारों के साथ| बहुत बहुत शुभकामनाएं|

  10. Indu, i like your poems. Not a poet myself but love the fact that your poems have very strong message and relevant. Keep it up.

  11. A very good poem and a special appreciation for keeping Hindi at the forefront.

    Social and satirical, just what i like.

  12. indu ji baat to aapne ekdum sahi kahi hai… ab jab bhi main apne gaanv jata hun,kuchh kuchh aisa hi mahsoos karta hun… bijli aa gayi par us chilchilati garmi mein bhji jo bachche dada dadi ko pankha kiya karte the, aaj poochh bhi nahi rahe..paise maangne pe mile to theek, nahi to unse bura koi nahi..waah re tarakki…

  13. घड़ी की सुई कभी पीछे को नहीं चलती है. समय की बलिहारी है. आपने वर्णन सही किया है. ये तो बिस्मिल्ला है आगे आगे देखिये होता है क्या ?

  14. If any one of these commenting group have heartily attachment to life of village than move towards to village and feel in really life what is exactly there. Its to be easy to write the poem about village but actually to difficult to live the life of village……….

  15. अधोन्मुखी विकास का दौर है …….क्या गांव क्या शहर…. सभी अपना अस्तित्व तलाश रहे हैं ….

  16. This is the status of not only the villages but towns and cities too!
    Which roots should we go to?

  17. बहुराष्ट्रीय कम्पनियो की गिद्द द्रष्टी अब गाँव पे लगी ह
    गाँवो मे अब प्रेम और सोर्हाद्य की कमी देखी जारहि ह

  18. रचना पसंद करने एवं अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देने के लिए आप सभी को धन्यवाद!यकीन जानिये आप सभी का स्नेह ही हमारी प्रेरणा है…

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s