बेमाने से रिश्ते


बेमाने से लगते हैं कभी सारे ही रिश्ते
जिन्हे अपनी जान,अपना हम समझते।
फ़िक्र है उन्हें ये गुमा सदा रहता
भेद खुलता जब दिल काँच सा बिखरता
ज़रूरत की खातिर ही बनते हैं रिश्ते
अपना कोई वजूद नहीं रखते ये रिश्ते
समाज की बेदी पर हर रोज नये सजते
सूख कर फिर शाख के पत्ते से गिरते
कब,कहाँ कुचले न कोई देख पाता
खु़द ही दफ़न होते और खु़द ही फिर रोते
नम आँखों से फिर किसी चाह को खोजते
सहारे को अपने हम रिश्ते हैं जोड़ते…

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12 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

12 responses to “बेमाने से रिश्ते

  1. रिश्ते खींचतान भी करेंगे, परेशान भी करेंगे, बस निभाते रहिये।

  2. rishte vyathit bhee karte ,
    man ko khush bhee karte
    kuchh dil se
    kuchh mazbooree mein
    nibhaane padte
    rishte to rishte hote hai
    bante bigadte rahte hein

  3. Life is so complicated and often relationship becomes its prey. Profound expression!

  4. आज-कल मतलब से जुडते है लोग ,
    किसी रिश्ते नाम कैसे दे हमलोग |
    उम्मीद पे दुनिया कायम है मगर ,
    सच्चे रिश्तेकी तलाश करती है नजर |
    नेक दिल की पीड़ा को सही तरीके से पेश किया है आपने | बधाई हो |

  5. मानो तो बंधन
    टूटे तो क्रंदन
    हो दिल में तो अनुनंदन
    ह्रदय से उपजे तो अभिनन्दन
    कहते हैं रिश्तों का ये चन्दन
    जहाँ मिले घसो बेटा रघुनन्दन

  6. यथार्थ की सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति …कवि इसलिए ही कह गया है ..
    नीड़ का निर्माण फिर फिर

  7. bahut sundar prastuti, jaise jo nibha jaaye uske vaise rishte, sabhi swaado se bhare kabhi, kabhi fike se rishte 🙂

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