मन की उलझन


कभी सोचता है उलझनों में घिरा मन
क्या ठहर गया है वक्त ? नहीं,
वक्त वैसे ही भाग रहा है
कुछ ठहरा है तो वो है मन,
मन ही कर देता है कम
अपनी गति को
और करता है महसूस
ठहरे हुए वक्त को
उसे नज़र आती हैं सारी
जिज्ञासायें उसी वक्त में,सारी
निराशायें उसी वक्त में
पर ठहरा हुआ मन अचानक-
हो उठता है चंचल मृगशावक सा
और करता है पीछा उस वक्त का,
जो बीत गया है।
नहीं चल पाता जब वक्त के साथ
सोचता है तब उसका
ठहरा हुआ मन,कि ये ठहराव
वक़्त का नहीं
ये तो है सिर्फ़ मन की उलझन।

24 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

24 responses to “मन की उलझन

  1. हालात
    व्यथित कर देते हैं
    मन को

  2. लगता है कि मन को आज काम से छुट्टी और आनन्द की आवश्यकता है🙂

  3. Beautiful…man shaant aur ashaant lahro ka bada samundar aur isme rehti hai anginut hulchul..bahut hi sundar kavita

  4. मन की उलझन बेकाबू है,
    यह सबके ऊपर लागू है।

  5. बहुत ही सुंदर मन की व्यथा .यह मन ही तो है जो नहीं मानता , पल पल दिखता है नया ऐना , हर बार समझाना पड़ता है, इसको …………..मन …………..🙂

  6. ठहरा हुआ मन अचानक-
    हो उठता है चंचल मृगशावक सा
    और करता है पीछा उस वक्त का,
    जो बीत गया है।
    नहीं चल पाता जब वक्त के साथ
    सोचता है तब उसका
    ठहरा हुआ मन,कि ये ठहराव
    वक़्त का नहीं
    ये तो है सिर्फ़ मन की उलझन।

    बहुत सुंदर !
    तोरा मन दर्पण कहलाए …

  7. मन की उलझन को सुलझाने की अच्छी कोशिश | सुंदर कविता के लिएँ बहोत-बहोत बधाई |

  8. कुछ उलझनें सुलझने के लिए नहीं होती हैं… वो तो बस होती हैं…
    सुन्दर अभिव्यक्ती!!

  9. चच्ञलं हि मन:कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्।।
    गीता 6-34!

  10. बहुत ही खूबसूरती से व्‍यक्‍त किया है … मन की उलझन को …

  11. very nice thoughts; and absolutely … what flows is mind .. whats rests is mind … what thinks is mind … what ceases is mind …

  12. beautifully crafted…..sahi bola aapne is man ke antardwand k baare me ..

  13. संजय भास्कर

    मन की उलझन को … खूबसूरती से व्‍यक्‍त किया है …

  14. मन की उहापोह को सुन्दर ढंग से प्रस्तुत करती प्रभावशाली रचना… मन के ही तो खेल हैं सब… मन के हारे हार है मन के जीते जीत….

  15. these days i am reading a book titled “the power of your subconscious mind” by joseph murphy……your poem just added a new chapter to my learning….

    as always….you are superb…..🙂🙂

  16. बहुत खूब लिखी है…
    क्या खूब सोच हैं……………….

    “ठहरे हुए वक्त को
    उसे नज़र आती हैं सारी
    जिज्ञासायें उसी वक्त में,सारी
    निराशायें उसी वक्त में
    पर ठहरा हुआ मन अचानक-
    हो उठता है चंचल मृगशावक सा

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