एक ख़्वाब जिसे मन नहीं समझ रहा


अलसाई हुई आँखों में
एक अक्स उभरता है
देखने पर ध्यान से
वो अर्श ठहरता है
फिर बोझिल सी आँखें
कुछ खुली कुछ मुँदी
स्मृति पटल पर कोई
ख़याल नहीं घूमता।
आख़िर कौन है यह,जिसे
मन नहीं समझ रहा
तमाम कोशिशों पर भी ये
नहीं पिघल रहा
तभी एक सिहरन सी और
आँख कुछ खुली
नज़र गई सीधे अर्श पर
चेहरा न था वहाँ कोई
वो अमावस की रात थी,
नहीं सौगात कोई।

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23 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

23 responses to “एक ख़्वाब जिसे मन नहीं समझ रहा

  1. कुछ शक्लें कुछ वाकये
    जाने अनजाने
    मन में घर कर जाते
    गाहे बगाहे याद आते
    मन में कुछ सवाल
    पैदा कर जाते

    इंदु की कलम से …..सुन्दर ख्याल

  2. संजय भास्कर

    बहुत ही सुंदर …. एक एक पंक्तियों ने मन को छू लिया …

  3. कुछ तो अनुत्तरित सा छिपा हुआ है, मन की पर्तों में।

  4. बेहतरीन अभिव्‍यक्ति
    कल 21/12/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्‍वागत है, मेरी नज़र से चलिये इस सफ़र पर …

  5. कविता के बारे में दुरुस्त ख़यालात हैं….अभी केवल हाजिरी लगा लीजिये ,कविता पर फिर कभी 🙂

  6. ख्वाब तो चले जाते हैं लेकिन अपने होने के अहसास को चेतना पर छोड़ जाते हैं…
    सुन्दर रचना!!

  7. वो माँ की साडी देख के जो माँ के आने का एहसास हुआ !

  8. सच कहूँ तो यह मेरे समझ के सीमा से कही ऊपर ही था , आप ने लिखा है तो बेहतरीन ही होगा |

  9. indu ji,

    bahut badiaya..

    end padte hue toh joh rhyme thi aur jo wording di .. mazaa aa gaya

    regards
    rahul

  10. बस एक आभास, एक छलावा …!!
    बहुत अच्छे इंदु जी ….

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