घना कोहरा


जब भी दिखता है घना कोहरा
यूँ लगता है जीवन का रूप दिख गया
घना है बहुत, पर साफ भी बहुत
न छुपने छुपाने को कुछ रह गया।
दूर से लगे, न कुछ दिख रहा
गर घुसते चलें तो वो छँट भी रहा
कभी लगे घना कभी बहुत गहन
फिर भी है उसे,चीरती सूरज की किरण
होता अपने चरम पर, फिर भी ख़त्म होता
पार करना उसे यूँ न आसान होता
फिर भी धीरे- धीरे सब करते ही जाते
जीवन से कोहरे को हटाते ही जाते
है बड़ा ही ढीठ,आ जाता बार-बार
जीवन भी अडिग,सहता कोहरे का प्रहार
भर कर नया हौसला बढ़ते ही जाना है
हर एक के जीवन से,कोहरे को मिटाना है।

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30 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

30 responses to “घना कोहरा

  1. संजय भास्कर

    क्या बात है!!!!! कितनी सकारात्मक बात.सच है

  2. संजय भास्कर

    अच्छी कविता है ..बधाई

  3. यूँ कई बार कोहरे अच्छे होते हैं , सबकुछ ढँक देते हैं …

  4. कितनी सरल, कितनी सहज,
    शब्दों के कोहरे से ढकी
    जीवन मूल को समझाती …अच्छा लिखती हैं …

    कभी सोचा है कि कोहरे का भी एक मोल है जिंदगी के यथार्थ को ढक, एक सुन्दर मंज़र सजा जाती हैं.,…….

  5. कई लोगों की दिवाली मानती है इस कोहरे रुपी चादर के तले जीवन में ….पर वो है की छंटता ही नहीं ..

  6. anu

    जिंदगी में आने वाला कोहरा …कभी कम तो कभी अधिक रहता है ….पर हर बार ….कोहरा घना और घना होता चला जाता है …अपने मन की उम्मीद ही इसे कम करती है …आभार

  7. Beautiful…Darkness is absence of light and not opposite of it. Very awesomely put. Keep writing such wonderful poems 🙂

  8. ओह, कोहरे की पीड़ा कोई उस आदमी से पूछें जिसको कोहरे की सघनता में मालगाड़ियों का संचलन देखना है। 😦
    कभी कभी लगता है कि कोई तकनीकी समाधान ही पार लगायेगा हमें!

  9. Barun Jha

    nicely worked out analogy..life is but a foggy morning..u vaguely know what lies ahead…but u walk into it…

  10. कोहरे से झूझता आदमी डटे रहने की प्रेरणा भी लेता है !

    • Induji,
      Here is a Google translation of this poem.You may correct where it’s needed and publish it in a English poetry section.

      When there’s heavy fog
      I saw just as life
      Is very dense, but clean too
      Was not hiding something to hide.
      Came from far and nothing seems to
      Do not go breaking Oh, he even blow away
      Never was never very extensive dense
      Yet he, customized with a ray of light
      Is at its peak, the ends
      It simply is not easy to cross
      But gradually when not all
      When removing the fog of life
      Is a very brash, come again and again
      Life stand, bear attack in fog
      Is a new spirit to move around
      Every one’s life, the fog is clear.

  11. Excellent imagination. Comparing life with thick fog, awesome. Keep going.
    “कभी लगे घना कभी बहुत गहन
    फिर भी है उसे,चीरती सूरज की किरण”
    i don’t know the reason but I liked those two lines.

  12. waah .. yeh poem ek inspiration hai ..

    bahut achi likhi hai…

    regards
    rahul

  13. dp

    फिर भी है उसे चीरती सूरज की किरण
    होता अपने चरम पर फिर भी खत्म होता !

    इन पंक्तियों में गहराई समाई है।

  14. HELLO INDU JI
    bahut hi sunder khana khohra .man ke badalo ko saaf karta .
    badhai , nice writing

    happy new year

  15. आपकी प्रार्थना निश्चय ही काम आयेगी..

  16. सुन्दर प्रस्तुति. कोहरे से हमें बड़ा प्यार रहा है.

  17. यशवन्त माथुर

    आज 21/01/2013 को आपकी यह पोस्ट (दीप्ति शर्मा जी की प्रस्तुति मे ) http://nayi-purani-halchal.blogspot.com पर पर लिंक की गयी हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!

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