निश्छल प्रेम


रामसरन चाचा की माँ
जिन्हें कहते सब काकी,
हमारे गाँव पँहुचने की ख़बर
न उनसे छुप पाती।
झट सन्देसा ले कोई आ ही जाता
कैसी हो बिटिया,बड़ा समय काटा।
काकी हैं बूढ़ी़, न चल फिर पातीं
फिर भी अपने हाँथों से पेड़े बनातीं
खाकर उन पेड़ों का अमृत सा स्वाद
नम आँखों से आती,फिर काकी की याद।
साँझ तक बिटिया,मिलने आना ज़रूर
काकी हैं बूढ़ी़ फिर मिलें न मिलें!
तुम्हारी पसंद की बनवाई है ‘रस खीर’
आ कलेजे से लगो,चाहे यही तकदीर।
देख ये निश्छल प्रेम का नाता,
खुद में हीन,काकी पे गर्व आता
हर एक गाँव में हैं कितनी ही काकी
जला रखी है जिन्होंने निश्छल प्रेम  की बाती।
रामसरन चाचा की माँ
जिन्हें कहते सब काकी,
हमारे गाँव पँहुचने की ख़बर
न उनसे छुप पाती…

34 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

34 responses to “निश्छल प्रेम

  1. वात्सल्य, निश्छल प्रेम, निस्वार्थ उदात्त भावना …. बचपन में खाये कुछ ऐसे ही पकवानों का स्वाद ताजा हो आया…
    धन्यवाद |

  2. प्रवीण पाण्डेय

    सबके ख्याल में डूबी चाची

  3. बहुत सुंदर रचना|
    कुछ रिश्ते वाकई कितने निस्वार्थ होते हैं|

  4. bahut badhiya…!!!! I really really liked this creation of yours. It really touched my heart..🙂

  5. संजय भास्कर

    Beautiful as always.
    It is pleasure reading your poems.

  6. डॉ. राजीव कुमारा रावत

    रोना आ गया, अपने बचपन की कई काकी काकाओं को याद करके ष
    उन सभी पवित्र आत्माओं को मेरा नमन

  7. bahut achchi kavita hai indu ..

    i could imagine/picturize it while reading it…

  8. कल 10/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

  9. anu

    अमिट प्रेम की छाप ….बहुत खूब

  10. काकी को मिलकर बहोत खुषी हुई | उनके सच्चे प्यार ने मन को भावविभोर कर दिया | बहोत अच्छे , धन्यवाद |

  11. गांव में आज भी निश्छल प्रेम मिलता है ..बहुत सुन्दर भाव लिए अच्छी रचना .

  12. ‘काकी’..सबूत हैं उन लोगों का ,जिनके बाल चांदी के हैं व मन सोने का ..
    खुशनसीब हैं वो जिनको ‘काकी’ सामान लोगों का प्यार मिलता है..
    अमर रहे ये ‘काकी ‘
    kalamdaan.blogspot.com

  13. dil ko chu..gayi…kuch sadharan panktiyan…aur ius jajbe ko bana gayi ati asadharan….beautiful

  14. यादें ……………………….. !
    बहुत सुन्दर यादें ! ! !

  15. ऐसे काकियों को नमन. बहुत सुन्दर रचना.

  16. Bahut sundar. yeh kavita padkar mujhe apni naniji yaad aa gayee…Bhagwaan kare unhe lambi umr mile. Barso huay, shayad 10 saal unse nahi mili mai. Jab bhi bachpan mai unke yaha jaati thi..apne jhuriyon wale haathon se laddu banati thi aur bahut hi prem se khud apne haathon se khilati thi.
    Indu, aapki yeh kavita man ko choo gayee. Mai apni mummy ko bhi yeh bhej rahi hu. Thanks so much for this beautiful poem. Bahut hi marmik.

  17. मन को छूते भावोँ से सराबोर रचना… ऐसा निश्छल प्रेम आज भी गावों में छोटे शहरों के मुहल्लों में बसा हुआ है, बड़े शहरों में तो लोगों के घर बड़े हो गये हैं लेकिन दिल सिकुड़ कर छोटे हो गये हैं जहाँ अपनों के लिए ही जगह नहीं तो ऐसे रिश्तों की गहराई कौन समझे. सीधे सादे सरल शब्दों में एक उत्कृष्ट रचना …
    सादर
    मंजु

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s