रात के जज़बात


सदा तुम्हारा इंतज़ार क्यूँ रहता
वज़ूद क्या नहीं, कोई मेरा
माना कि तुम हो उजली साफ
तो क्या? जीवन नहीं घनेरा
हर आशा को सदा,तुझसे ही
जोड़ा जाता,जबकि
निराश और थके आते हैं सब
सदा,मेरी बाँहों में समाते हैं सब।
समझती उन्हे और हौसला भी भरती
चूम पलकों को झट आगोश में लेती
फिर भी कहते हैं लोग,फ़िक्र न कर
कट जाएगी रात—
आएगी सुबह,ले नई सौगात।
नई सोच को बल,सदा मुझसे
ही मिलता….
न मुझे कोई देखता,न कोई सराहता
जबकि हर जिस्म में,
ऊर्जा भरती हूँ मैं
थपकी मीठी नींद की,उमंग भरती हूँ मैं
हूँ ख़ास तो बहुत, फिर भी…..
क्यूँ रहता सदा तेरा इंतज़ार।

(रात के सवाल हैं सुबह से कुछ ख़ास)

19 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

19 responses to “रात के जज़बात

  1. क्यूँ रहता सदा तेरा इंतज़ार। Wah , Really liked the post.
    Its been again picturistic and thoughtful and on the reader to take whatever way they want top take it.

    wow

  2. kya baat hai
    raat ki kahani..raat ki zubani
    bahut sundar peshkash

  3. सुबह ने कहा –
    कैसे न हो मेरा इंतज़ार
    तुम्हें भी चाहिए आराम

  4. आस किसी की मन को खींचे बार बार क्यों,

  5. रात के सवाल हैं सुबह से कुछ ख़ास, वाह !
    It’s true in life we take many things for granted!

  6. A fantastic piece of work..
    I Admire creator’s caliber and
    Wish fulfillment of aspiration…

  7. आएगी सुबह,ले नई सौगात।
    नई सोच को बल,सदा मुझसे
    ही मिलता…..bahut hi sunder saugaat pyare se jajbaat , khoobsurat intjar …bahut bahut badhai .

  8. achi rachna hai….good inspiring effort and i feel that waiting is not that bad as it seldom make you realise the real worth of the thing…..

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