मन बस यूँ ही मुस्काता है


बचपन से ही चलती गाड़ी से
सड़कों को देखना भाता है हमें
लगता था कि सड़क भाग रही है
और हम पीछे छूट रहे
बड़ा अचरज होता था तब।
कभी दूर सड़क पर पानी का दिखना
मृग तृष्णा का अर्थ,तब पता ही न था
जीवन के सबसे बड़े अजूबे
तब यही तो लगते थे।
आज यूँ बड़े हो,सब समझ तो गए
पर वो नासमझी के अचरज
मन खुद को वहीं कहीं पाता है
हम नहीं,सड़क चल रही
पेड़-पौधे चल रहे,
सोच इन यादों को
मन बस यूँ ही मुस्काता है।

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27 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

27 responses to “मन बस यूँ ही मुस्काता है

  1. नहीं समझ में आता कि समय घिसटता है कि हम..

  2. it feels beautiful to recall those moment
    i read it many times
    thanks for sharing 🙂

  3. dr ashutosh mishra

    पर वो नासमझी के अचरज
    मन खुद को वहीं कहीं पाता है
    हम नहीं,सड़क चल रही
    पेड़-पौधे चल रहे,
    सोच इन यादों को
    मन बस यूँ ही मुस्काता है।……har aadmi sadak par aa gaya …chal to wakai sadak hee rahi hai….ham aaj bhee to nasamajh hai..jindagi kee jis daud me aap haam daud rahe hain mrig trishna hee to hai..muskurana accha hai par jab tak samajh nahi aayegi mrigtrishna ke peeche bhagenge..hakikat me ham aaur hamara man aaj bhee bacpane kee sthiti me hai..bhola aaur massom….hamari masssomi ke karan hee desh itni tarakki kar gaya..jis desh me log sadak jaantee nahi the wahan adhi janta sadak par hai…aaur yahi hal raha to is sadi ke ant tak poora desh sadak par hoga…..bura naa maano holi hai…sadar badhayee aaur amantran ke sath

  4. bahut khubsurat

    a wonderful tribut to long lost innocence 🙂

  5. Good as always. I too have written poems in Hindi. The last one was Sulagate Aansu. Also, I have a facebook page called Lyrical. Look forward to your joining

  6. लगता था कि सड़क भाग रही है
    और हम पीछे छूट रहे
    बड़ा अचरज होता था तब।
    कभी दूर सड़क पर पानी का दिखना
    मृग तृष्णा का अर्थ,तब पता ही न था
    जीवन के सबसे बड़े अजूबे
    तब यही तो लगते थे।… waakai

  7. वो नासमझी के अचरज … और अब समझदारी के /// शायद पहले वाले ही अच्छे हैं
    सुन्दर !

  8. बस… यूँ ही मुस्कुराते रहिये…

  9. जीवन अनुभूति की सहज-सुंदर प्रस्तुती | वाह- दिल खुश हो गया | धन्यवाद |

  10. मन खुद को वहीं कहीं पाता है
    हम नहीं,सड़क चल रही
    पेड़-पौधे चल रहे,
    सोच इन यादों को
    मन बस यूँ ही मुस्काता है।………बहुत खूबसूरत तरीके से मन के भावो को प्रस्तुत किया है ………मन यूँ ही मुस्काता है ……….:):)
    🙂 बधाई …..:):):):)

  11. अप तो समझ गये हैं, हम अभी तक कंफ्यूजन में रहते हैं इस सापेक्षता के सिद्धांत में! 🙂

  12. बहुत खूब, कहाँ इस भागती जिंदगी को सहसा एक ब्रेक लगा गयी आपकी रचना.. रोक इस भागते को पल को बचपन कि तरफ मोड गयी … बहुत सुन्दर रचना ..छोटी छोटी बाते कहा खो जाती है..आज कहाँ कोई रुक कर उन लम्हों को सहेज पाता है.. उन्ही लम्हों मैं और ढेर सारी बातें छिपी हुई है..

    देख मृग तृष्णा को, दूर सड़क पर
    गीले राह से डर जाना
    पापा कि ऊँगली पकड़ फिर
    दूर राह को दिखलाना
    पापा का फिर जोर से हसना
    गाड़ी और तेज चलाना
    माँ का फिर देख मुस्काना
    ममता भरी आँखों से
    बालों में ऊँगली घुमाना

    भैया भी क्या घमंड दिखाते
    बीस की छाती चौबीस कर के
    हमको मृगतृष्णा समझाते
    पास बैठी दीदी भी क्या खूब
    बत्तीसी से मुह वो सजाती
    गीली राह के अपने डर पर
    कितने कथा वो कह जाते
    कहाँ गयी वो मृग-तृष्णा
    और कहाँ गए वो नन्हे पल

    आज सजे है हर तरफ बस
    अर्थ लोभ का एक माया
    मृगतृष्णा में भाग रहे हम
    छोड़ आये सब मृगतृष्णा
    भाग रहे हैं सिर्फ सड़कों पर
    छोड़ गये सब मृगतृष्णा
    …………… यूं ही लिखते रहिये indujee

  13. सुंदर प्रस्तुती. यूं ही लिखते रहिये..:)

  14. बहुत ही खूबसूरत. हम भी बचपन में कुछ क्षण खो गए. आज भी अपने बगल की ट्रेन चलती है तो खुद की गाडी के चलने का आभास होता है.

  15. Beautiful….innoncent time, innocent thought -Thanks for reviving the childhood memory..and you are- Un yaadon ko soch aaj bhi muskurata hai dil..:)

  16. इंदु, एक छोटी सी बात, बचपन की तुमने कितनी खूबसूरती से शब्दों में डाल दी. I really liked this poem. Indeed, worth appreciation (well, as all your poems) 🙂

    I think, my personal favourite from your collection.

  17. इन्दु जी,

    कविता अपने साथ बहा ले जाती है, सधा हुआ शब्दशिल्प, एक अच्छी कविता के लिए साधुवाद।

    मुकेश कुमार तिवारी

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