औरत की दुश्मन है औरत यहाँ


औरत की दुश्मन है औरत यहाँ
फिर भी औरत ही बेचारी यहाँ
हर हादसे का मुजरिम
क्या आदमी ही है ?
हाँ !
इल्ज़ाम लगा औरत
बन गई बेगुनाह
भ्रूण से जन्म तक वो चाहे यही
हो लड़का ही पैदा न लड़की कभी
लड़की जो जन्मी तो कर्ज से भरी
लड़का ले आएगा धन की पोटली
लड़की पराई न काम की किसी
लड़के से जीवन की नईया टिकी
ये सोच ….ये सोच
सिर्फ आदमी की नहीं है यहाँ
औरत ही ज़्यादा है स्वार्थी यहाँ
हैवानियत है मर्दों की चारों तरफ
क्या यही इक पहचान उनके लिए
बेचारियत है औरतों की चारों तरफ
क्या यही सच्चाई है उनके लिए ?
हैवानियत का ताज है आदमी के सर
इस पीड़ा को कैसे वो पिये हर पल
अबला है औरत और मासूम भी
इस आड़ में ही औरत बेफिक्र यहाँ
न खुद से है प्यार न खुद की  तलाश
है औरत ही दुश्मन औरत की यहाँ।

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35 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

35 responses to “औरत की दुश्मन है औरत यहाँ

  1. बिलकुल ठीक….
    बधाई अच्छी पोस्ट के लिए

  2. सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति.

  3. ravinder rajput

    mane nahi manta app sabhi ko nahi kah sakti …

  4. anju(anu)

    जिंदगी का सच …..एक दम सच

    होली की शुभकामनएं

  5. सार्थक व सटीक लेखन …आभार ।

  6. Anand Soni

    औरत की दुश्मन है औरत यहाँ……………

    Good one

  7. you have said something that people dont accept and it is true a woman can or is the worst enemy of another woman ..

    lovely poem

    Bikram’s

  8. जीवन के सत्य को शब्दों में लिखा है आपने …
    यथार्थ लिखा है जीवन का ..

  9. Aksar hum sachhai se dur bhagte hai aur apni kismat aur apne aap ko koste rahte hai…………
    but it is nice………

  10. सच कड़ुवा होता है .
    बयाँ करना मुश्किल
    समझा पाना तक़रीबन नामुमकिन …
    ——
    इंदु जी आप सफल रहीं
    सादर

  11. इंदु जी,

    बहुत ही अच्छा मुद्दा उठाया है आपने अपनी रचना में.. यह तो एकदम सच है कि औरत ही औरत की जादा बड़ी दुश्मन हैं… हालाँकि इसका यह मतलब कतई नहीं है कि पुरुष प्रधान समाज का पुरुष इस बात से निर्दोष सिद्ध हो जाता है…

    यह बात तो सही है कि माँ को बेटे की चाह जादा होती है, पर इसका मतलब यह तो नहीं को वो बेटी को प्यार नहीं करती, उसको जन्म नहीं देना चाहती… लेकिन यह भी सच है एक माँ को कन्या भ्रूण की हत्या करने को मजबूर करने वालों की जमात में मुख्या भूमिका औरत की ही होती है

    औरत ही औरत की जादा बड़ी दुश्मन है इसका एक और उदहारण है ….. बलात्कार की शिकार औरत से औरतें जादा नफरत करती हैं, उससे दूरी बनाये रखने की कोशिश करती हैं मानो वो कोई छूत की बीमारी है, यह जानते हुये भी कि उस सारे प्रसंग में उस शिकार हुयी औरत का कोई दोष नहीं है… उसके साथ खड़े हो कर दोषी को सजा देने के बजाय उसको ही बहिष्कृत करने का अन्याय करती है..

    हालाँकि आज समाज का रुख बदल रहा है..लोगों का नज़रिया बदल रहा है. सच कहा जाये तो न औरत न पुरुष…. यह दोष है सारा मानसिकता का….इसलिए नारी पुरुष पर परस्पर आरोप प्रत्यारोप करने के बजाय हमें अपनी लेखन की सम्पूर्ण ताकत के साथ इस बीमार मानसिकता का विरोध करना चाहिये और उसको सुधारने में अपना योगदान करना चाहिये

    सामाजिक समस्या पर बात करती हुयी इस शशक्त रचना के लिए आपको बहुत बहुत बधाई….

    सादर
    मंजु

    • बहुत खूब ..दोष मानशिकता का ही.. औरत हों या मर्द दोनों ही शोषण करते हैं दोनों ही शोषित होते हैं..
      फिर सिर्फ पुरुषों कों दोष क्यूँ…

      आपके विचार से सहमत हूँ और आपके टिप्पणी के लिए बहुत बधाई

  12. lovely poem…

    हैवानियत का ताज है आदमी के सर

    yeh line padhkar main apne sir ke upar dekhta raha 😀

  13. इंदु जी, Hats off to you! you touched a tender nerve.
    सच कहने और सुनने के लिए साहस की जरूरत होती है|
    हम रोजाना ही बसों में, सड़कों पर महिलाओं के साथ छेड-छाड की घटनाओं के बारे में देखते और सुनते हैं, और अमूनन यही मान लेते हैं कि महिलाएं असुरक्षित होती हैं| लेकिन क्या हमने कभी यह सोचा है कि एक पुरुष के लिए क्या स्थिति बनती है अगर उसकी कोहनी भीड़ में, किसी महिला को छु भर जाए और महिला यह समझ बैठे कि पुरुष उसके साथ छेड-छाड कर रहा है| अचानक, एक ही पल में एक भला सा व्यक्ति, दुष्ट, घोर अत्याचारी और बस अभी-अभी जेल से छूटा हुआ बदमाश नजर आने लगता है| जैसे उस व्यक्ति का तो बस काम ही बसों में घुसकर दिनभर महिलाओं को कोहनी मारना ही हो| क्या आपने उन्हें गिरयाते और उस जुर्म की बार-बार माफी मांगते हुए देखा है जोकि उन्होंने किया ही नहीं? जबकि भीड़ को वह व्यक्ति एक punching bag से ज्यादा कुछ भी नजर नहीं आ रहा होता है|
    (जी नहीं! मुझे अभी तक ऐसी किसी स्थिति में फंसने का दुर्भाग्य प्राप्त नहीं हुआ है 🙂 )

  14. Very sincere and heartfelt lines!!
    Happy Women’s Day in advance!!

  15. जगदंबा के सामने झुके ब्रम्हा , विष्णु ,महेश ,
    यह जो ना जाने औरत , क्या है मर्दोंका का दोष ?
    औरत को कोसती देखा औरत, है क्यों हमपे रोष ?
    आपकी ताकत नही जानी आपने , क्या यह भी है ,
    हम बेचारें मर्दोंका , पहेलिसां बेवाजहाँ दोष ?
    फिर भी मैं कहूँगा , सोचने पे मजबूर मेरा होष ,
    आपकी सच्ची कविता का क्या इसमें है दोष ?
    छोडिए हमारी बेवकूफ़ी,
    सुंदर है आपकी प्रस्तुती |
    धन्यवाद |

  16. A nice abstract composition..
    but do not consider as absolute..:)
    Best of luck.

  17. Beautifully penned down Indu! Nice thoughts! Every word has a ring of truth!

  18. That was some exceptional stuff…Maybe an ugly truth for many women in the society which noone would accept… :O

  19. That is so true. Wemen are there own enemy. I wish wemen would start realising and changing that. Thaz when we will be in a safer world. A deep emotion, beautifully depicted.

  20. वाह इन्दुजी आपने तों एक आंदोलन सा ही छेड़ दिया अपने रचना से..
    बहुत अच्छा लिखा हैं आपने ….

    अपने समाज में यदि शोषित एक औरत है, तों उसे अबला दिखा कर सारा समाज पुरुषों पर दोष थोप देता है. ठीक इसके उलटा गर शोषण का शिकार एक मर्द हों.. तों समाज उसकी खिल्ली उड़ा कर मामला कों कचरे में डाल देता है..या विश्मित सा एक चिन्ह लगा कर कहीं फेंक दिया जाता है..या फिर सबल होने का मुखौटा पहने वो पुरुष ही सब कुछ छुपा जाता है…
    सारा दोष एक मानसिकता की है …जो शोषित हुआ उसका, जिसने शोषण किया उसका
    यूं ही लिखते रहिये

  21. इन्दु जी एक बेहद बेहतरीन कविता के माध्य्म से आपने समाज पर बेहतरीन चोट की है आपने यह लेख मई में लिखा था लेकिन आज एक ब्लॉगिंग मंच पर मैने कुछ ऐसा ही पढ़ा एक बार जरूर नजर डालें आखिर इसने कौन-सा पाप किया है?: http://socialissues.jagranjunction.com/2012/10/25/girl-child-abortion-%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%82%E0%A4%A3-%E0%A4%B9%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE/

  22. बिलकुल ठीक….
    बधाई अच्छी पोस्ट के लिए

  23. हमारा साधुवाद स्‍वीकार हो
    आप ने सही लिखा है,

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