हरा पत्ता


टूटा हुआ एक पत्ता आज राह में मिल गया,था तो बिल्कुल हरा और नया सा। उसकी उम्र अधिक न थी, शायद
इसी ऋतु में जन्मा था वो। बेहद नर्म बेहद मासूम। देखते ही रो पड़ा नवजात शिशु की भाँति और कहने लगा कि मुझे
भूख लगी है स्नेह की पर मैं तो गिर गया शाख से,अब कैसे जुड़ूँ वापस। मुझे नहीं पता कि मैं खुद गिरा हूँ या कि गिराया गया हूँ लेकिन शाख के बड़े पत्ते मुझसे कह रहे थे कि तू यहाँ नहीं रह सकता, यह शाख हमारी है हम तुझसे अधिक बलशाली हैं। बड़े हैं उम्र में,कद में-पद में भी। तू यहाँ आ तो गया शाख की मर्ज़ी थी पर हम तुझे यहाँ बसने नहीं देंगे,तुझे गिरा देंगें और फिर पता नही शायद मैं सोया था या स्वप्न में,पर जब आँख खुली तो मैंने खुद को ज़मीं पर धूल से लिपटा पाया। हाँ धूल नें मुझे डाँटा नहीं बल्कि गले से लगाया लेकिन मैं तो अपनी शाख को चाहता हूँ और शाख मुझे लेकिन एक बात और मेरी समझ में नहीं आ रही कि शाख ने मुझे गिरने क्यो दिया? क्य शाख उन बड़े पत्तो से कमज़ोर है या कि पत्ते अधिक बलशाली,बात तो एक ही हुई ना…तो फिर? कहीं ऐसा तो नहीं कि शाख को भी मुझसे प्यार नहीं वो भी बस चाहती है उन्ही पुराने पत्तों का साथ।
जीवन चलता रहता है सबका आदि और अन्त है फिर किसी के साथ यह पहले और किसी के साथ बाद में क्यों? हर पत्ते का हक है कि वो शाख पर जन्मे और बढ़े। हरा फिर भूरा फिर सूखा और अन्त में बेरंग सा शाख से अलग हो मुक्त हो जाए। किंतु उस कोमल से हरे पत्ते को तो अभी जीना था,अपना हर रंग। फिर क्यों सिर्फ हरा रंग ही उसकी किस्मत बन गया। अब उसे चाहे जितना सहेजें वो हरा न रह पाएगा,हाँ उसकी रंगत ज़रूर बदलेगी पर न बदलेगा कद-काठी। ख़ामोश हो गया आज वो हरा पत्ता…

41 टिप्पणियाँ

Filed under अभिलेख

41 responses to “हरा पत्ता

  1. what a wonderfully reflective post. Using the example of a leaf you have said so much about so many things. Very matured and insightful thinking. Loved it!

  2. कई बार समय से पहले नया ही गिर जाता है और उसकी वेदना असहनीय होती है- शब्दों से परे

  3. Sundar rachana… Patte ke madhyam se ek arthpurn evam bhav purn sandesh. Vishay vastuon ki vividhta apke lekhan atyant prabhavshali banati hai

  4. yashwant009

    आपको नव संवत्सर 2069 की सपरिवार हार्दिक शुभकामनाएँ।

    —————————-
    कल 24/03/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

  5. arun chandra roy

    भावुक मन के विचार…

  6. यही तो होता है, जब कोई भी नया व्यक्ति समूह द्वारा ठुकरा दिया जाता है। अच्छे शब्द बिंब

  7. jeevan dene vaale ki hi marji par sab chalta hai kuch patte hare hi toot jaate hain kuch apna jeevan poora karke sookh kar toot jate hain.aapne bahut gahri baat likhi hai apni rachna ke madhyam se.

  8. एक बहुत ही उत्कृष्ट लेख| इंदु जी, एक पत्ते के माध्यम से आपने बहुत ही गहरी बात कह दी|
    अब क्या होगा अगर शाख के बड़े पत्ते, हर नए उगने वाले हरे पत्ते को शाख से यूँ ही गिराते रहेंगे? आखिरकार एक ऐसा वक्त आएगा जबकि किसी भी शाख पर कोई नया पत्ता नहीं रहेगा, और बड़े शक्तिशाली पत्ते धीरे-धीरे पुराने होकर, सूखकर नीचे गिरने लगेंगे| फिर जीवन-रस न मिलने के कारण पहले एक शाख सूखेगी फिर दूसरी, और फिर पूरा पेड ही सूख जाएगा| शाख, शायद इस बात को जानती है और इसीलिए वह हरे पत्ते से इतना प्यार करती है| क्योंकि हरे पत्ते ही तो पेड का भविष्य हैं|
    ऐसे ही सोचने को मजबूर करने वाले लेख लिखते रहिये🙂

  9. Philosophical prose written so poetically… marvelous Indu!
    -Amit Agarwal(on ‘Haraa Pattaa’)

    Amit ji aapka comment ye raha….

  10. Mukesh Mishra

    इंदु जी, आपकी इस प्रस्तुति में अभिव्यक्त हुई हरे पत्ते की यातना और उसकी इच्छाएँ व आशंकाएँ एक तरफ हमें स्वयं अपनी आत्मा के विषाद को परखने का अवसर देती हैं, तो दूसरी तरफ अपनी आत्मा की आशंकाओं से संवाद के लिए प्रेरित भी करती हैं |

  11. बहुत खूबसूरती से लिखा आपने

  12. Very interesting variation from your normal style, thought provoking….wonderful to see the progression

  13. Very interesting article, deeply philosophical yet so simply jotted…
    A must read!

  14. Sanjay Mishraa 'habib'

    प्रतीकों के माध्यम से अद्भुत चिंतन…
    सादर.

  15. मानव की स्वार्थी भावना का सुंदर प्रतिकात्मक चित्रण | धन्यवाद |

  16. Asim Jairajpuri

    CLAP CLAP… TOO GOOD A WRITE,, YOU WROTE A MARVELLOUS PIECE … MUCH APPRECIATION.. INDU JI..

  17. soudamini venkatesh

    absolutely thot provokin— tooo gud a write up indu ji—kudos—-

  18. हर पत्ते का हक है कि वो शाख पर जन्मे और बढ़े….
    बेहतर…

  19. ब्लॉग पर देरी से आने के लिए क्षमा

    जीवन त्रासदी का भावुक चित्रण ,किसका साथ कब तक ,कोई नहीं जानता ,मन कितना भी चाहे इच्छा अनुरूप कुछ नहीं होता ,कौन याद रखेगा? कौन भूल जाएगा ?सब कुछ जैसा उसके द्वारा नियत है

  20. शशि प्रकाश द्विवेदी

    पत्ता गिर गया , रंग बदलेगा जरूर ….पर न बढ़ेगा न पोषित होगा ,
    पत्ते की ओट में बड़ी भारी बात कह दी ……

  21. Ek Pattey ki itni mehekti hui zindagi.. Kabhi pata hi nahin tha, ki patta bhi itney dukh sey guzar sakta hai

  22. इन्दु जी जीवन के गहन दर्शन को आपने पात के माध्यम से बखूबी समझा दिया है। आपका यह गद्य भी ललित गद्य है , काव्य की तरह माधुर्य से रससिक्त । बहुत बधाई !

  23. पंछी

    nice… indu ji can you tell me how can we add fb like button in share this option.

  24. very good thoughts.
    Here are few lines from Gujarati poem.
    પીપળ પાન ખરંતા હસતી કુંપળીયા,
    મુજ વીતી તુજ વિતશે ધીરી બાપુળીયા…
    पीपळ पान खरंता हसती कुंपळीया,
    मुज वीती तुज वितशे धीरी बापुळीया…
    Meaning..
    Buds laugh as leaves fall
    Be patient,you may go through same fall, say leaves to buds

    .ભારત કી સરલ આસાન લિપિ મેં હિન્દી લિખને કી કોશિશ કરો……………….ક્ષૈતિજ લાઇનોં કો અલવિદા !…..યદિ આપ અંગ્રેજી મેં હિન્દી લિખ સકતે હો તો ક્યોં નહીં ગુજરાતી મેં?ગુજરાતી લિપિ વો લિપિ હૈં જિસમેં હિંદી આસાની સે ક્ષૈતિજ લાઇનોં કે બિના લિખી જાતી હૈં! વો હિંદી કા સરલ રૂપ હૈં ઔર લિખ ને મૈં આસન હૈં !

  25. इंदु जी,आपने हरे पत्ते के माध्यम से जीवन दर्शन की बहुत गहन बात और समाज में प्रचलित बुराई नए को आसानी से स्थान न देने को बड़ी बाखूबी से चित्रित किया है …बधाई व शुभकामनाएं …

  26. waah sarthak post indu ji , ahi kaha aapne jeevan ke karib ki baat hai hara patta gir to jata hai par vapis aapni jado tak nahi pahuch pata bilkul ……tootate parivar aur budhe ma baap ki tarah . :))))feel good to read this post

  27. bhawna vardan

    beautifully symbolizing life with a green leaf,really touching lines….

  28. शब्द अच्छे है……….. मन को छूने वाले ………..

  29. induji’
    Patte ke maadhyam se aap ne to jivan ki sachchai kh di hai!
    Vinnie

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