न रूचि है पता न शौक की है तलाश…


कितनी अलग होती हर एक इंसान कि दुनिया,सोचने पर विवश करती अजब है ये दुनिया।अनगिनत वाकये हैं सभी के पास,कितना भी साझा करो कम ही होगा.यहाँ हम बात कर रहे हैं ‘रूचि और शौक’ की.जैसे एक पाठक को पुस्तकों से प्रेम है,संगीतकार को संगीत से इसी तरह हर किसी की रूचि भी अलग और शौक भी अलग अलग होते हैं।
फिर भी न जाने कितने लोग हैं जिन्हें न तो रूचि कभी मिल सकी और न ही उनके शौक कभी जग सके.जिनसे यदि आप पूछे भी तो उन्हें पता ही नहीं की ये दो शब्द भी जीवन में कहीं ठहरते हैं.हाँ ! मुश्किल है यकीन कर पाना, पर सच है यही.उन्हें जीवन से कोई शिकायत नहीं वो खुश हैं अपने उस सच के साथ जहाँ सपने उन्हें कभी सताते नहीं, लेकिन भर जाते हैं दर्द भरे भाव से ये लोग हमें.सभी जगह बिखरे हैं ऐसे अनगिनत जीवन चाहे जहां गौर कर लीजिये।सिनेमा हाल हो या क्रिकेट का स्टेडियम,स्टेडियम में करीब पच्चासों हज़ार लोग टिकट खरीद कर आते हैं अपने शौक के लिए। स्टेडियम के बाहर झंडे,सीटी,टोपी आदि न जाने क्या-क्या खरीदते हैं,पर ये सामान बेच रहे बच्चे या बड़े उनका मैच से कोई सरोकार नहीं, उन्हें न तो ‘रूचि’ पता है और ‘शौक’ तो कभी उनकी पकड़ आया ही नहीं वो तो बेहद खुश हैं की आज उनकी बिक्री खूब हुई ,आज नींद बहुत सुकून लाएगी.स्टेडियम के अन्दर लगातार चिप्स,कोल्ड ड्रिंक्स बेचते लोग गलती से भी अपनी गर्दन क्रिकेट ग्राउंड या चौके-छक्के पर नहीं घुमाते.वो तो बस अपना काम जानते हैं की अधिक से अधिक अपना सामान बेंच सकें .ताज्जुब होता है जहाँ हज़ारों लोग शोर मचा रहे हैं,कूद रहे हैं वहीँ ये दुकानदार कितने शांत-कितने गंभीर…क्या इन्हें ये शोरगुल सुनाई ही नहीं पड़ता ? शायद हाँ !! क्यूंकि उन्हें इस क्षणिक ख़ुशी के पागलपन का कोई अहसास नहीं,ये तो खुश होंगे तब जब उम्मीद से अधिक बिक जायेंगे इनके चिप्स के पैकेट.ये मात्र एक उदाहरण है ऐसे लोग हर जगह हर घर के करीब हैं कहीं वो सब्जी वाला है,कहीं कपड़ो में प्रेस करने वाला है, कहीं मजदूर है तो कही किसी पेड़ की छाँव तले छोले-कुल्चे बेचने वाला. अनगिनत रूप बिखरे हैं हर जगह.
हैं मज़बूत ये हर मौसम की मार से,
हैं जीते ये हर दिन के वार से.
सिर्फ आज में जीते हैं न कल की कोई आस,
न रूचि है पता न शौक की है तलाश…
चाहे जिधर देख लो न कोई है जवाब बस उमड़ते-घुमड़ते फैले हैं चारों तरफ से सवाल – कि ज़िंदगी है तुझे सलाम,जिंदा रह पाई तू फिर भी जब न खबर है की सुबह है या शाम……

16 टिप्पणियाँ

Filed under अभिलेख

16 responses to “न रूचि है पता न शौक की है तलाश…

  1. rajtela1

    कहाँ फ़िक्र किसी को –किसी की
    सब अपनी अपनी “मैं “में मस्त
    दूसरा हो कितना भी त्रस्त
    खुद को खुश होना चाहिए
    दूसरा बहाए आंसू कितने भी
    खुद को हँसना चाहिए…..
    सार्थक,विचारोत्तेजक रचना…..

    यूँ ही गाढ़ते रहो झंडे इंदु तुम
    लिखते रहो हर विषय पर
    उठाते रहो नित नए सवाल

  2. बिल्‍कुल सच कहा आपने …बहुत बढिया लिखा है …

  3. yashwant009

    कल 29/04/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    हलचल – एक निवेदन +आज के लिंक्स

  4. काश यही समझ में आ जाता कि हमें क्या चीज सचमुच में भाती है।

  5. Nice post. And pretty convincing examples to get your point through.

  6. रूचि और शौक इनके चोंचले है जिनके पेट रोज भरतेही है , जिन्हें आज का खाना नसीब होगा के नही इसका पता नही वह तो कूड़ा-दान मे पड़ा खाना ही खा लेते है | इसे विटंबना कहिये या हमारा खुशनसीब | विचार करनेपर मजबूर करनेवाली सुंदर प्रस्तुती | धन्यवाद |

  7. सबसे बड़ा काम स्वयं को खोजना है, इस दुविधा से उबरना है कि हम वास्तव में क्या चाह्ते हैं! सार्गर्भित लेख के लिए बधाई !

  8. अनु

    जीवन अपनी प्राथमिकताएं तय कर लेता है खुद ब- खुद………….
    शौक कहीं दब जाते हैं ज़रूरतों के तले…..
    सार्थक लेखन इंदु

    अनु

  9. कुछ ऐसे ही छुए अनछुए पहलू जीवन को अपने रंग में रंगने कि हस्ती संजोये ए लोग शौक और रूचि वालों के आडंबरों से ज्यादा संतुष्ट हैं….सार्थक लेख …

  10. Awesome… Love your written work. It’s gotten hard to find good work in hindi, and you are good😀, Cheers !

  11. आत्मा को टटोल ना जिंदगी है , अपने आप को भी मंथन करना जरुरी है ,
    क्या हुवा जो रूचि जगा न सके हम अपने मैं , दुसरो की रूचि सिराहना भी एक अभिरुचि है

  12. radhika somani

    बहुत सुन्दर रचना ..

  13. unhe jab apni rojmarra ki jaruraten puri karne se fursat mile to koi shauk paida ho …ye intellectual bat hai aur intellectuals ke liye hai …achchha likha hai …aapne

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