कुछ न भाये,बिन तुम्हारे


कुछ न भाये,बिन तुम्हारे
अब तो जीवन में
लो शरण में,दो दरस अब
यही चाह जीवन में ।
मन बना,मंदिर है जबसे
सूरत तेरी ही बसी
दिन-रात नवाऊं शीश अपना
चाहूँ, तुझको जीवन में ।
हर दिन पिरोऊँ पुष्प माला
अपनी चाहत की
इक रोज़ पहने,तू स्वयं आकर
यही ख़्वाब जीवन में ।
खुद न कहीं मै, बस तू है
मेरी साँसों में जो चलता
इक बार आकर छू ले मुझको
जी-जाऊँ जीवन मैं ।

21 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

21 responses to “कुछ न भाये,बिन तुम्हारे

  1. अनुपम भाव संयोजित किये हैं आपने …

  2. rajtela1

    तेरे बिना जीवन अधूरा
    सम्पूर्ण उसे कर दे तूँ

  3. avibration

    As always good control & command,
    This one, well expressed surrender..
    Why you are off the site after the break!

  4. बहोत ही सुंदर कविता | मानो ऐसा लग रहा था की मीरा अपने शाम को आपकी कविता सुनाकर बुला रही हो | बधाई |

  5. इंदु जी बहुत ही अद्भुत वियोग शृंगार रस की प्रस्तुति !!

  6. शनिवार 26/05/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. आपके सुझावों का स्वागत है

  7. खुद न कहीं मै, बस तू है
    मेरी साँसों में जो चलता
    इक बार आकर छू ले मुझको
    जी-जाऊँ जीवन मैं ।

    बहुत खूब ………..

  8. Sanjay Mishraa 'habib'

    बहुत सुन्दर भाव भरी रचना…

  9. Shankar Mishra

    This is a very good poem.I liked it very much.

  10. The last four lines are the ones I liked the most. Very well put up.

  11. Very nice.. .heights of devotion.. nice kavita to be shared with… Today I have subscribed your posts… so, whenever U post something new…I will definitely be there..

  12. सुन्दर भाव सुन्दर रचना इंदु जी

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