ग़र कभी न कहोगे


ग़र कभी न कहोगे है मोहब्बत तुमसे
इस सच को सदा भ्रम ही मानते रहेंगे।

ग़र कभी न कहोगे बस तुम्हारा हुआ मै
भला कैसे खुद को, फिर ग़ैर न कहेंगे।

ग़र कभी न कहोगे सुनो मेरी जान
इस जाँ को फिर कैसे तुम्हारा कहेंगे ।

ग़र कभी न कहोगे हर हक़ है तुम्हे
भला किस हक़ से पुकारा करेंगे ।

सुनो! कह भी दो अब,जो दिल चाहे कहना
हर लफ्ज़ को तुम्हारे ,हम अपना कहेंगे।

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20 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

20 responses to “ग़र कभी न कहोगे

  1. pecheedaa darkhwaast hai…pray he understands!
    (…beautiful poem:))

  2. हर लफ्ज़ को तुम्हारे ,हम अपना कहेंगे।

    true love…. very nice…

  3. भावमय करते शब्‍दों का संगम .. बहुत खूब ।

  4. यशवन्त माथुर

    बेहतरीन

    सादर

  5. यशवन्त माथुर

    कल 15/06/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

  6. anju(anu)

    प्यार के एहसास के साथ …प्यार ही प्यार

  7. yashoda

    सुनो! कह भी दो अब,जो दिल चाहे कहना
    सुन्दर रचना

  8. गर हम कहे की प्रस्तुती अच्छी है ,
    “हम जानते है “,यह तो ना कहोगे ?

  9. सुनो! कह भी दो अब,जो दिल चाहे कहना
    हर लफ्ज़ को तुम्हारे ,हम अपना कहेंगे।……bahut sweet indu ji ,,,,,,,,,,:)) lovely poem

  10. It’s almost like an OMG moment poem, so true and so verbose in just a few words…beautiful

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