साक्षर हूँ नौजवान हूँ


साक्षर हूँ नौजवान हूँ
घरों से कूड़ा  उठाता हूँ
पुश्तैनी काम है….
बाप-दादा निरक्षर थे
रोटी के वास्ते इसी पे निर्भर थे
मुझे ! साक्षर बनाया
माँ की आँखों ने सपना पहनाया
मगर फिर भी…
न बदला कुछ
साक्षरता ने कैसा अभियान चलाया ।
रोटी के लिए,कितनो को खटकाया
जब ,न जुटा पाया रोटी दो वक्त की
न बाप की लाठी , न दवा माँ की
फिर , मैंने हांथों में टोकरा उठाया ।
बस ! इतना न समझ पाया ,क्यूँ
माँ ने था मुझे सपना पहनाया
कोई काम छोटा या बड़ा नहीं
ये तो – माँ ने समझाया
फिर किस वास्ते मुझे साक्षर बनाया ।

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24 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

24 responses to “साक्षर हूँ नौजवान हूँ

  1. Prashant Rai

    सचमुच ह्रदयविदारक रचना मैम !
    बहुत सुन्दर !
    एक साक्षर की लाचारी को बहुत ही सुन्दर तरीके से अभिव्यक्त किया है आपने !
    आपका सदैव आभारी !
    बहुत-बहुत धन्यवाद !

    • इंदु जी एक वर्ग विशेष के साक्षर व्यक्ति को इस तरह लाचार बनने को जो लोग विवश करते हैं वो यह क्यों भूल जाते हैं कि यदि हम वैदिक काल पर दृष्टिपात करें तो वहाँ इस आशय के मन्त्र उपलब्ध होते हैं जिनमें एक व्यक्ति कहता है कि “मैं एक अध्यापक हूँ, मेरी माँ पीसनहारी है, मेरे पिता वैद्य हैं, मेरा भाई लोगों के जूते बनाता है………” यानी एक ही परिवार में हर प्रकार का कर्म करने वाले लोग हुआ करते थे जिसे बाद में लोगों ने ऊँच नीच का दर्ज़ा देकर उन परिवारों को वर्गों में या जाति में बाँट दिया |

  2. मन लगा कर जो भी काम मिले, लगे रहना चाहिये।

  3. rajtela1

    असली साक्षर को
    किसी भी कार्य को
    करने में शर्म नहीं आती
    सुन्दर विचार ,सुन्दर भाव
    सदा की तरह एक अच्छी रचना

  4. Hi Indu

    Touched! Wonderful use of words to convey the plight of many talented youngsters in this country.

    But Yes! the winner is the one who goes beyond all falsehoods and accepts any job with honour.

    Enjoyed reading your poem … even in the gloom it gives rise to hope!

  5. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति … आभार

  6. यशवन्त माथुर

    कल 22/06/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

  7. बेहतरीन, सोचने के लिए मजबूर करने वाली रचना, इंदु जी!

    शायद साक्षरता, हमें सवाल उठाना सिखा देती है, निरक्षर मनुष्य तो सवाल भी नहीं उठाता, वह तो इसे बस अपनी किस्मत मान का खामोश हो जाता है|

  8. ह्रदय-स्पर्शी प्रस्तुती | वाकई इस देश मे ऐसी अवस्था जरूर है की साक्षर लोगोंको अपने लायक और पसंद का काम मिलना कठिन है | लेकिन सुबह होगी ऐसी आशा जरूर है |

  9. साक्षरता के सही मायनों की तलाश करती खूबसूरत रचना… शुभकानाएं..

  10. मन के हारे हार है, मन के जीते जीत…

  11. saras darbari

    एक और कड़वा सच ….सुन्दर प्रस्तुति

  12. anju

    वाह बहुत खूब …जिंदगी का सच

  13. Ashish kumar

    bahut achi rachna hai ye induji.. ap har kavita itne sahaj aur saral shabdo me likhti hain jo kaabiletarif hai… 🙂

  14. ये जिंदगी है ही कुछ ऐसी …………एहसासों में बहती रहती है

  15. a beautiful poem.. its so true no work is big or small, its ure efforts thats imp for success.

  16. bahut badhiya subject uthane ki koshish ki hai aapne Indu ji …nicely written and well composed

    parantu ye samsyaein hum kewal blogs, facebook and virtual world tak hi simit kar dete hain …no real step is being taken for the betterment …this is the bitter truth.
    kewal chand wah wahi ke shabd aur fir agla page ya blog… kahani khatam..
    there are many of us, well trained and educated, doing very well in life but couldn’t spare even few hours in a five yrs span to cast our vote ..and shrugs..”who cares”…and situation remains same. lot has been written and lot many are being written and in adtion lot many are to come ..but difference are yet to be seen in reall scenario.

    I really pray..these words of yours shall bring some differences ..by the gentlemen and ladies who have appreciated here will take it in true sense and will do some in reall ground … this time at least.

    keep raising the issues….good luck!!!!

  17. milind n lahane

    mubarak ho har din aur aaj ka din hindi padane ka moka mila pida ka sahaj aur saral vivaran he

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