होते जो बड़ी शाख हम


होते जो बड़ी शाख हम पड़ती नज़र तुम्हारी
नन्ही छोटी टहनियों को भला कौन देखता है।

बढ़ेंगी ये टहनियां भी एक रोज़ तो ज़रूर
जीवन क्रम को भला कौन रोक सकता है।

हाँ ग़र मरोड़ कर तोड़ दिया किसी ने कभी
कोपल फिर से आने में वक्त ज़रा लगता है।

बढ़ती है धीरे-धीरे कोपल शाख की तरह जब
राहगीर तब भी कुछ मुस्कुरा के यूँ गुज़रता है।

बन जायेगा वट- वृक्ष फैलेंगी लताएँ खूब जब
हर पैमाना तब,बस वट वृक्ष पे खरा उतरता है।

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17 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

17 responses to “होते जो बड़ी शाख हम

  1. प्रवीण पाण्डेय

    बड़ी टहनियाँ छोटी छोटी को बड़ा सहारा देती हैं

  2. बढ़िया…. आशावाद को छूती हुई सी
    बहुत अच्छी लगी.

  3. यशवन्त माथुर

    बहुत ही बढ़िया

    सादर

  4. सुंदर प्रस्तुती | कभी फुरसत मे हमारे ब्लॉग पर भी आइये | आपसे ही प्रेरणा लेकर की है पहली कोशिष | धन्यवाद |

  5. बढ़ती है धीरे-धीरे कोपल शाख की तरह जब
    राहगीर तब भी कुछ मुस्कुरा के यूँ गुज़रता है।
    bahut khoob

  6. rajtela1

    hot jo badee shaakh tum,
    baithteee chidiya tum par
    jeene ke liye
    lataayein saharaa letee
    tumhaaraa

    badaa honaa gunaah nahee
    aachran chhotaa honaa gunaah

    chhoton kaa saath nibhaanaa
    khyaal rakhnaa zarooree

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