चाहा तो बहुत


आज बहुत चाहा लिख सकूं कुछ
कलम उठी बार-बार
कुछ है जो उमड़ रहा
आने को बाहर
फिर भी शब्द
पकड़ न सके कलम को
निः शब्द होने का अर्थ
शायद ! यही हो….

13 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

13 responses to “चाहा तो बहुत

  1. जब मन बेचैन
    स्थितियां प्रतिकूल
    लिखने की बात तो दूर
    बात करने की
    इच्छा भी नहीं होती
    शुभकामनाओं के साथ
    राजेंद्र

  2. गहन भाव लिए बेहतरीन प्रस्‍तुति

    कल 04/07/2012 को आपकी इस पोस्‍ट को नयी पुरानी हलचल पर लिंक किया जा रहा हैं.

    आपके सुझावों का स्वागत है .धन्यवाद!

    ” जुलाई का महीना ”

  3. यशवन्त माथुर

    निः शब्द होने का अर्थ
    शायद ! यही हो….

    (कि कुछ शब्द ,निः शब्द कर देते हों,शब्दों को )

    बेहतरीन लिखा है आपने।

    सादर

  4. dnaswa

    कई बार सही शब्द नहीं मिल पाते भावों कों … पर ये भी तो कविता हिया अपने आप में …

  5. Dr.Gayatri Gupta

    आज चाहा तो बहुत कि
    आपकी कविता की तारीफ में
    कुछ लिख दें, मगर
    निःशब्द होने का अर्थ शायद यही है… 🙂

  6. Very niccccc……….Dr.Gayatri Gupta

    Bahut acchi Kavita hai aapki Induravi Singh

  7. waah indu ji shabd nahi phir bhi kalam bahut kuch kah gay , aisa hota hai kabhi kabhi , kalam saaath hi nahi deti ……..:)) aur phir chupchap shuru ho jati hai ,.

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