सब गलत-हम सही


सब गलत बस हम सही
यही ज़िद ही मुँह की खाती है ।

क्यूँ भला किसी और को माने
सोच दूसरे की,सराही नहीं जाती है ।

कब बदलेगा देश, बदलेंगे लोग कब
न बदलेंगे हम कभी,रीत चलती जाती है।

इंतज़ार सबके बदलने का,है दिनों-रात
बदलाव के स्वागत की रुत नहीं आती है ।

बातें हैं बड़ी-बड़ी, है लिखा भी बहुत
इंसान बने रहने में ही,मेहनत बड़ी आती है ।

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19 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

19 responses to “सब गलत-हम सही

  1. rajtela1

    kahte bhee sab jaante bhee sab ,insaan banne ke liye ,kadam aage badhaanaa bhee zarooree hai ,dil-o-dimmag se ,’main ‘nikaalnaa bhee zarooree hai

    Kalam par nikhaar aata jaa rahaa hai,ek baat poochh loon ,kalam kee chamak ke liye kaun see cream lagaatee ho

  2. A poignant piece. How true..! Aaj ke din mein yahi sab se badi samasya hai…” इंसान बने रहने में ही,मेहनत बड़ी आती है”

  3. यशवन्त माथुर

    बहुत ही बढ़िया

    सादर

  4. इंतज़ार सबके बदलने का,है दिनों-रात
    बदलाव के स्वागत की रुत नहीं आती है ।

    बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ.. अच्छी लगी कविता..

  5. इंसान बने रहने में ही,मेहनत बड़ी आती है

    एकदम सही कहा… इन्सान बने रहना ही तो बहुत मुश्किल काम हो गया है आज, क्योंकि आज की दुनिया में हैवानियत का ही बोलबाला है, इंसानियत तो कहीं खोती ही जा रही है और ऐसे में इन्सान बने रहने के लिए बहुत कोशिश करनी पड़ती है…बहुत सुंदर, सार्थक और सामायिक रचना…सशक्त लेखन के लिए बधाई.
    मंजु

  6. उत्कृष्ट एवं सराहनीय रचना । सच ही कहा आपने: “इंसान बने रहने में ही,मेहनत बड़ी आती है ।” आदि, अंत और सारांश यही है ।

  7. kaafi sehajta se aapne manushya ke is swabhaav ko apni is rachna me dikhaya haii….
    apki is kavita ki taarif me main do panktiyaan kehna chahunga..
    “shabdon ka aisa bahaav , pehle kabhi dekha nahi.
    itni sundar kavita pehle, maine kabhi padha nahi.. “

  8. anju(anu)

    कुछ कुछ सपनों सा …कुछ हकीकत सा ….

  9. bahut gehri baat bahut asaan shabdon mein keh daali aapne … bahut acha lagaa

  10. Yogesh Dabra

    हमारे पास सारी दुनिया की problems का हल है सिरफ अपनी का नहीं। हमें यह बाखूबी पता है कि किसको कब कया करना चाहिये पर खुद को नहीं

  11. इक-इक पत्थर जोड़ के मैंने जो दीवार बनाई है
    झाँकूँ उसके पीछे तो रुस्वाई ही रुस्वाई है
    बाहर सहन में पेड़ों पर कुछ जलते-बुझते जुगनू थे
    हैरत है फिर घर के अन्दर किसने आग लगाई है
    देख रहे हैं सब हैरत से नीले-नीले पानी को
    पूछे कौन समन्दर से तुझमें कितनी गहराई है…

  12. Deepak Tak

    this one is my favorite till now..kataaksh se shuru aur kataaksh par hi khatm…this is true badi baaten kar toh lete hain hum bas insaniyat hi nibha len toh bhi baht bada yogadaan samaj me de sakte hain.

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