सोई हुई नज़्म को भावों ने छुआ जब


सोई हुई नज़्म को भावों ने छुआ जब
बह निकली संग उनके नदी की तरह ।

छोटी-बड़ी लहरें उफनती रहीं नदी संग
पिरोती रही नज़्म उन्हें जीवन की तरह ।

गहराइयों की खोज में निकला कोई जब
ले आई नज़्म ढूंढ जीवन सीप की तरह ।

थे भाव बंद सीप में,नज़्म के बेहद करीब
वो करती रही महसूस उन्हें रूह की तरह ।

जब-जब भी भावों ने पुकारा है नज़्म को
जी उठी हर बार वो नए जीवन की तरह ।

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16 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

16 responses to “सोई हुई नज़्म को भावों ने छुआ जब

  1. आपकी अभिव्यक्ति नज़्म की तरह भावुक और सौन्देर्यमयी है

  2. rajtela1

    जब-जब भी भावों ने पुकारा है नज़्म को
    जी उठी हर बार वो नए जीवन की तरह ।
    ban ke lafz bahne lagee
    manon ko lubhaane lage

  3. हमेशा की भांति आपकी रचना गहरे भाव और सौन्दर्य से भरपूर है! रचना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि लेखिका संवेदनशील और भावों से ओतप्रोत है! इतने गहरे भावों को समझने के लिए सच्चे ह्रदय और सकारात्मक सोच की जरूरत है! बधाई और शुभकामनाएँ!

  4. loads of poems have been written on this topic…but this one deserves to stand out…gr888 one…

  5. वाह-वाह क्या खूब | वाकई भावानाओंका तूफ़ान जब भी उठता है दिल में , शब्द आ जाते है उसे शांत करनेको और एक नयी नज्म , कविता,गजल जन्म ले लेती है | बधाई |

  6. anju(anu)

    वाह बेहद खूबसूरत भाव …

  7. Lovely. How long does it take to write this poem? What time of the day do you write?

  8. lovely indu,थे भाव बंद सीप में,नज़्म के बेहद करीब
    वो करती रही महसूस उन्हें रूह की तरह awesome lines 🙂

  9. बहुत सुन्दर लिखा है इंदु जी……..
    Jeevan ko Jeene ke prayrna miltti hai
    सुन्दर ……

  10. शब्दार्थ तो समझ में आया लेकिन, शायद, भावार्थ नहीं ….call karke samjhana padega aapko mujhe….

  11. सुन्दर रचना … काफी गहराई है इस कविता में |

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