इक आग धधकी हर सीने में…


सर से पाँव तक ढके रहना चाहिए
कहने वाले ही
बड़ी तीव्रता से
हटा देते हैं सारे कपड़े
और टूट पड़ते हैं
भूख मरे की तरह
पहले अपनी गिद्ध सी
आँखों से नोचते हैं
फिर अपने वहशी दाँतों से…
खून से लथपथ उनके दाँत
उनके हाँथ
कभी टूटते  क्यूँ नहीं
मरते क्यूँ नहीं ???
कैसा है ये “उसका” न्याय
मन की शक्ति नारी को
और तन की इन पुरुषों को ?
है श्रष्टिकर्ता से यही सवाल
जीवन दिया फिर क्यूँ
होने दिया ये हाल
मर्दानी ताकत का एक ही रूप
तोड़ो नारी को नोचो जिस्म खूब …
पिए वेदना के हर पल कड़वे घूँट
सड़ रहे  जीवन में  लांछनो के भूत !
हर प्रश्न चिन्ह कर दिया है खड़ा
घेर सवालों  में नारी को
पुरुष बेशर्मी से तना खड़ा …

25 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

25 responses to “इक आग धधकी हर सीने में…

  1. यशवन्त माथुर

    कल 15/07/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

  2. Prashant Rai

    Mam, aap ki kalam me takat hai ! sach me ! bahut hi karara jawab diya hai aap ne samaj ke un bhakshko ko jo kabhi naree ke pavitrata ko aur orem ko samajh hi nahi saka .!

  3. इस बात में कोई संदेह नहीं है कि आपने अपने तरीके से स्त्री और पुरुष की आदिकाल से चली आ रही घिनौनी स्थिति का आज के सन्दर्भ में एक नंगा चित्र खींचने का सार्थक प्रयास किया है, लेकिन केवल सांत्वना या रुदन से समस्याओं के समाधान नहीं हो सकते हैं! जब तक हम गहरे में जाकर कारणों पर चिंतन नहीं करेंगे, कुछ कभी बदलेगा, ऐसा सोचना खुद को ही धोखा देना है! समाज या सरकार या तथाकथित बुद्धीजीवी वर्ग द्वारा पुरुष और नारी के अदभुत मनोविज्ञान को समझने के लिए किसी प्रकार का प्रयास नहीं किया जाना और हजारों वर्षों से नर-नारी का बालपन से ही विभेदपूर्ण, बल्कि अमानवीय समाजीकरण किये जाने को समाज की लगातार मान्यता, पुरुष के अवचेतन में नारी के प्रति भोगवादी लिप्सा को उत्तरोत्तर एक से दूसरी पीढी को सौंपते जाना, कुसंस्कारित करती धर्म में लिपटी संस्कृति को मान्यता देना अपने आप में अपराध को बढ़ावा देने के सामान ही है! इसे केवल आंसू बहाकर, सांत्वना देकर या दो-चार दिन चिल्लाकर नहीं बदला जा सकता! इसके लिए इतिहास के क्रूर पन्नों की काली करतूतों से लेकर, आज की सजावट में लिपटी कुचेष्टाओं तक चिंतन और मनन के बाद सतत वैचारिक जनांदोलन की सख्त जरूरत है! जिसकी शुरूआत माँ को बेटा और बेटी में बिना विभेद पालन पोषण करने से और पिता को सामान संरक्षण तथा पुरुस्कार देने से करनी होगी, जिसे विद्यालयों में पल्लवित और पुष्पित करना होगा! जिसमें कानून की ताकत के साथ-साथ, समाज की स्वेच्छा सहभागिता बेहद जरूरी है!
    निसंदेह आपने सटीक लिखा है! साधुवाद!
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

  4. “कुसूर उस शख्स का भी था बहुत कुछ – किसी कारण जो कुछ बोला नहीं था”

  5. प्रशांत वर्मा

    पुरुष अत्याचार सहती नारी ह्रदय की वेदना का मार्मिक चित्रण कर आपने दिमाग में ऐसा तूफ़ान खड़ा कर दिया है कि मैं निःशब्द हूँ …..क्या ऐसा भी स्वरुप है मेरी जात का ….शर्मिंदा हूँ मैं ….उनके किये की कोई माफ़ी नहीं है …जितनी सज़ा दी जाए कम है …सामजिक वहिष्कार होना चाहिए ऐसे दरिंदों का …

  6. शर्मनाक घटना
    इंसानियात लज्जित हुई

    आज फिक्र नहीं की कोई और है
    कल होगी बहन बेटी बहू घर की
    हर कीड़ा जानवर हो जाएगा
    क्या हालत हो जाएगी शहर की

  7. आपकी धधकती आग़ को मैं समझ सकता हूँ | शर्म से हम भी है गर्दन झुकाए खड़े | यह कैसी मर्दानगी जो नारी का सम्मान ना करे | हे चंडी माता हमें माफ करदे , तू जो उठ खड़ी गुस्सेसे तो भगवान भी ना हमें बचाएँ |

  8. यह आग धधकनी ही चाहिए … अच्छी प्रस्तुति

  9. dnaswa

    कितने कडुवे सच कों लिखा है … पुरुष के दोनों घिनोने चेहरों से नकाब उठाती प्रभावी रचना …

  10. i read it on FB , each word speaks of your frustration bt wt cn one do ??

  11. “पुरुष बेशर्मी से तना खड़ा..”
    This is not entirely true… my head hangs with shame.

  12. This is such a powerful poem .. I read and reread it many times just now .. I am angry, ashamed and sorry.

  13. Induji with due respect to your thoughts I personally dismiss your thought because not all the Male are that way, for the deeds of few people we can not blame the class in general…..
    There certainly are Gents who really Honour ladies.
    There are people who think wife is is always his Better half ……..Personally I feel Proud to admit this.
    kuch galat kaha ho to App se chama chaunga,
    Sadhuwad……..

    • बहुत अच्छा लिखा इन्दु जी | उत्तर में कुछ पंक्तियाँ मेरी अपनी रचना से :

      एक उम्र आती है, जब जनयित्री
      दूध पिलाती ख़यालों से टकराती है
      “क्या मैं सचमुच माँ हूँ ?”
      हाँ, “तथाकथित”
      क्योंकि कल मेरा ही जाया
      खड़ा कर देगा मुझे भीड़ भरे चौराहे पर
      अकेली, कुचली जाने के लिये
      तब मैं रह जाऊँगी बनकर “तथाकथित”

  14. घेर जवाबों में नारी को
    पुरुष बेशर्मी से तना खड़ा …
    ..कायर होते है ऐसे पुरुष जो नारी को अबला समझ अत्याचार करते हैं ..
    अब वक्त अपने लडाई खुद लड़नी की …बस दुस्साहस की जरुरत है ..
    बहुत बढ़िया चिंतन ..सार्थक प्रस्तुति
    आभार

  15. काम गंदे सोंच घटिया
    कृत्य सब शैतान के ,
    क्या बनाया ,सोंच के
    इंसान को भगवान् ने
    फिर भी चेहरे पर कोई, आती नहीं शर्मिंदगी !
    क्योंकि अपने आपको, हम मानते इंसान हैं !

  16. मार्मिक चित्रण … करार जवाब उनलोगों को जो इस प्रकार की घटिया हरकतें करने की जुर्रत रखतें हैं…
    ऐसे दरिंदो के लिए मौत की सजा भी कम है…

    समाज का एक करवा सच जो कई सालो से व्याप्त है जिसे दूर करने की बहुत आवश्यकता है ….

    असाधारण रचना…..

  17. Good one. I believe it is more to do with the upbringing and thats where intervention in required. The people who committed the act have ruined their own life and for what ? Just an act of reflected glory ?? And as for the girl she should have no reason to hide but should be given a chance to spit and slap the molesters in public and in front of their mothers and sisters.

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