तुम्हरी भई हूँ मै, मोरे कन्हइया…


तुम्हरी भई हूँ मै, मोरे कन्हइया
हर पल लिए जाऊँ तोहरी बलइयाँ ।

गोरा बदन मोरा साँवरा भयो रे
रंग ली है तोरे रंग,अपनी चुनरिया ।

मीरा बनी तोरी राधा भी बनी हूँ
चाहूँ संग तोरा,गुजरी हैं सदियाँ ।

तोहरे मिलन की है आस ऐसी जागी
दिन है कटे न मोरा,कटे नहीं रतियाँ ।

लो आज जनम फिर हमरी खातिर
चलती है साँस मोरी जैसे जले बातियाँ ।

हे मुरली धर… बालगोपाल आ भी जाओ अब
सब रस्ता देखें तोहरा, हर्षित कर जाओ अब ….जन्माष्टमी की ढेरों शुभकामनाओं के साथ 🙂

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10 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

10 responses to “तुम्हरी भई हूँ मै, मोरे कन्हइया…

  1. जाकी तन झाईं पड़े श्याम हरित दुति होय …..
    सुन्दर अभिव्यक्ति इन शब्दों की याद दिलाती …
    कृष्णाष्टमी की शुभकामनायें!

  2. सुन्दर कविता, जन्माष्टमी की बधाईयाँ..

  3. आपको भी जन्माष्टमी की शुभकामनाएँ…
    आपका ब्लॉग अच्छा लगा…

  4. Deepak Tak

    You have an amazing world of imagination and soperb skill to put your words in a poetry like that one..JAI SHRI BANKE BIHARI LAAL KI aap ko bhi Janamashtami ki shubhkaana.

  5. श्री कृष्ण जन्माष्टमी की आपको भी बहोत-बहोत शुभकामनाएँ | सुंदर प्रस्तुती |

  6. Only after reading one of the comments, I realised that it is written on the occasion of janmastami. A refreshing change

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