सच है ! दुनिया बड़ी रंगीली


सच है ! दुनिया तेरे रंग अजीब
सफ़ेद था जो
काला हो गया
और काला,
फिर बगुले सा सफ़ेद
रंग पे रंग बदलते जाते-
चढ़ते जाते, लेकिन
कभी कोई हल्का न पड़ता
काला वापस सफ़ेद कैसे ?
इतने बदलते रंगों में
भला किसे अपनाया जाए
हर रंग का है अलग रंग,
भरमाता हुआ –
बूझो तो जाने ???
सच है ! दुनिया बड़ी रंगीली …

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14 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

14 responses to “सच है ! दुनिया बड़ी रंगीली

  1. यशवन्त माथुर

    बहुत ही बढ़िया

    सादर

  2. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 22/08/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

  3. sunil kumar

    बहुत अच्छी भावाव्यक्ति , बधाई

  4. अलग अलग रंग …. अच्छी प्रस्तुति

  5. सच ये दुनिया यूँ ही रंग बदलती जाती हैं ..
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति

  6. अंजु(अनु)

    सच जाने तो इस सतरंगी दुनिया का अपना कोई रंग नहीं ….सिवाए प्रेम के

  7. mere payre kavi api yeh kavita muje acchi lagi sachh hai woh duniya rang niral hai api likha hai sahi aur sachh hai mai i am kyaal hoo ap ka

  8. रेखा

    ये दुनिया बडि रंग बदल ती

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