याद करूँ या नहीं तुम्हे अब !


याद करूँ या नहीं तुम्हे अब
ये भी समझ नहीं आता
नदिया के दोनों छोर हुए हम
बीच में जल ही जल आता ।
अब होगा कैसे पुनर्मिलन
ये भी तो बतला दो तुम
जल-जल कर जीवन से मेरे
ये जल ही क्यूँ न कभी जाता ।
जब भी झाँकूँ खुद के अन्दर
निर्झर झरता रहता जल
जब भी चाहूँ तुझे देखना
कर देता ये आँखें ओझल
अब जल जाऊँ या कि रहूँ मै
ये भी समझ नहीं आता ।
याद करूँ या नहीं तुम्हे अब
ये भी समझ नहीं आता…

28 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

28 responses to “याद करूँ या नहीं तुम्हे अब !

  1. नदिया के दोनों छोर हुए हम
    बीच में जल ही जल आता ।
    अब होगा कैसे पुनर्मिलन………..

    Bahut khoob Induji.
    Parallel’s But definitively made for each other……..

  2. बहुत उन्दा…

    अस्थि है की हर पल गले, हस्ती है की बनती नहीं,
    “रूह” याद कर उसको हरदम, जो पार लगाये कश्ती तेरी…

  3. यशवन्त माथुर

    जब भी झाँकूँ खुद के अन्दर
    निर्झर झरता रहता जल
    जब भी चाहूँ तुझे देखना
    कर देता ये आँखें ओझल

    बेहतरीन पंक्तियाँ

    सादर

  4. after a long time m here.but whenever i come feel very good…:)nice poem

  5. i am the lover of sad poerty,somewhere i can feel a liitle starnge pain while readig this….every line and the way you used words are so meaning ful and effective.I LOVED THE PAIN AND MIXED FEELINGS IN IT.

  6. याद करो इंदु…खूब याद करो…बीच में जो आंसुओं का जल है….वही मिलन करवाएगा….जब फना हो जाओगे दोनों उसी नमकीन पानी में

  7. दो छोरों के बीच बहता जल एक दिन सूख जायेगा, किनारे मिल जायेंगे।

  8. अंजु (अनु)

    इस जल ही जल में खुद ना डूब जाना …बस इतना सा ध्यान देना

  9. anita

    बहुत सुंदर !
    नादिया के दो छोर के जैसे…साथ चलें पर मिल न पाएँ…
    जो नापो गहराई इस रिश्ते की….जल में जीवंत समाधि जैसी…🙂

  10. नदिया के दोनों छोर हुए हम
    बीच में जल ही जल आता ।
    अब होगा कैसे पुनर्मिलन
    ये भी तो बतला दो तुम
    जल-जल कर जीवन से मेरे
    ये जल ही क्यूँ न कभी जाता …..
    ——–
    अद्भुत अभिव्यक्ति Indu जी …

  11. वाह!
    (Btw, it feels so good reading about a lot of water in your poem and some relief as we live in a world with acute shortage of watter:) )

  12. ह्रदय कि वेदना को बखूबी कलमबद्ध किया है आपने .. बच्चन जी कविता स्मरण हो आई … उस पार पिए तुम हो मधु है , उस पार न जाने क्या होगा !

  13. भावस्पर्शी सुंदर प्रस्तुती | बधाई | धन्यवाद |

  14. यशवन्त माथुर

    कल 26/08/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

  15. सो अनायास ही हिचकियाँ
    नहीं आती मुझे,
    और तेरा नाम लेते ही
    हर बार छू मंतर हो जातीं!

  16. अनाम

    sach me, indu ji mere satth bhi kuch aisa hi hai…
    u r always best..

  17. बहुत सुन्दर…मन को छूते अहसास…

  18. श्रीप्रकाश डिमरी

    बहुत ही भाव पूर्ण अभिव्यक्ति …सादर !!!

  19. शायद यही दशा आजकल मेरी भी है.

  20. सुन्दर कविता. जल शब्द का सुन्दर प्रयोग

  21. अनाम

    आह !
    अब जल जाऊँ या कि रहूँ मै
    ये भी समझ नहीं आता ।
    याद करूँ या नहीं तुम्हे अब
    ये भी समझ नहीं आता…
    कितना सुंदर लिखते हो आप इंदु जी कहाँ ऐसी कवितायेँ अब पढ़ने को मिलती हैं !

    याद करते रहिएगा…वैसे रोक तो नहीं पायेंगे आप कोशिश भी मत कीजियेगा कष्ट ही होगा !

  22. sudesh bhardwaj

    जब भी चाहूँ तुझे देखना
    कर देता ये आँखें ओझल
    …………..bahut sunder kavitaa hai…….thode shabdo m gazab kiyaa hai…….gahre arthon ko vyakt karti kavitaa rachne ke liye ……thnx.

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