कहीं भीतर ही भीतर कुछ टूट रहा है …


कहीं भीतर ही भीतर
कुछ टूट रहा है
बिखर रहा है कहीं कुछ
जैसे बिखर जाए
हाँथों से राई
टूट जाए अचानक
मनचाहा फूलदान
कहीं भीतर गहरे
गड़ रहे हैं टूटे टुकड़े
समेटी भी नहीं जाती
उनमे फँसी बिखरी राई
इतनी गहराइयों में
जा टूटा है कहीं कुछ
आवाज़ उसकी-पीर उसकी
ध्यान से भी सुनी नहीं जाती
काश ! इन भीतर की गहराईयों
के रास्तों का पता होता
सजा देते नया फूलदान
वो भी चटक पीली राई से भरा हुआ …

11 टिप्पणियाँ

Filed under कविता

11 responses to “कहीं भीतर ही भीतर कुछ टूट रहा है …

  1. या शायद मैं इन्हें निकालना नहीं चाहती , इस दर्द से ही गीत पाना चाहती हूँ

  2. यशवन्त माथुर

    बहुत ही बढ़िया

    सादर

  3. dnaswa

    इस पीर को खुद ही पीना होता है … नए फूल भी खुद ही लगाने पड़ते हैं … लाजवाब अभिव्यक्ति …

  4. एक गहरी साँस मन की पोरों को भरती है।

  5. अंजु (अनु)

    दिल के अहसास को शब्द दे दिए गए …सादर

  6. अनाम

    टूट के बिखरे मन की गहराइयों मैं जा चुभे …अपने ही दर्पण के टुकड़े थे

  7. फूलदान में राई का बिम्ब बहुत ही सुन्दर बन पड़ा है !

  8. विनेश कुमार सिंह

    आज इसे एक समाचारपत्र के संपादकीय कार्यालय में पढ़ने का अवसर मिला…बहुत सुन्दर है, आपकी यह रचना.

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